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Indian Evidence Act/BSA Case Law Hindi Medium
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भारतीयसाक्ष्यअधिनियम (Indian Evidence Act) | |
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सामान्यसिद्धान्त | |
मामले | निर्णीततथ्य |
1. जोधनबनामम. प्र. राज्य, 2015 (3) सी.सी. एस.सी. 1217 (एस.सी.) | उपहत साक्षी के परिसाक्ष्य का अपना स्वयं का ही महत्त्व है और उस पर विश्वास व्यक्त किया जाना है, जब तक मुख्य परस्पर विरोध एवं असंगतियों के आधार पर उसके साक्ष्य को नामंजूर करने के ठोस आधार नहीं हैं उपहत साक्षी को विधितः विशेष प्रास्थिति प्रदान की गई है और उसको हुई उपहति घटना स्थल पर उसकी उपस्थिति की अंतर्निहित प्रत्याभूति होती है। |
2. खुर्शीदअहमदबनामजम्मूएवंकश्मीरराज्य, (2018) 7 एससीसी429 | पेश किये गए साक्ष्यों का विश्लेषण करते समय न्यायालय को एक अत्यंत तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। न्यायालय को मामूली विरोधाभासों पर साक्ष्यों को भी खारिज नहीं करना चाहिए। |
3. कामेश्वरसिंहबनामबिहारराज्य, (2018) 6 एससीसी433 | एक स्थिति में झूठा, सभी स्थितियों में झूठा (falsus in uno, falsus in omnibus)' सिद्धांत भारत में लागू नहीं होता है। यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह अनाज को भूसे के ढेर से अलग करे। सच्चाई का पता लगाना न्यायालय का कर्तव्य है। साक्षी की गवाही में सच्चाई होने पर साक्ष्यों में मामूली विरोधाभासों और चूक को नजरअंदाज किया जाना चाहिए। |
4. महेन्द्रनबनामतमिलनाडुराज्य, (2019) 5 एससीसी67 | सर्वोच्च न्यायालय ने अच्छी तरह से तय स्थिति को दोहराया कि 'एक स्थिति में झूठा, सभी स्थितियों में झूठा (falsus in uno, falsus in omnibus)' सिद्धांत भारत में लागू नहीं होता है। न्यायालय ने कहा कि अगर साक्षी की गवाही कथन के हिस्से के संबंध में अविश्वसनीय है, तो आरोपी को दोषी ठहराने के लिए कथन के दूसरे हिस्से को आधार नहीं बनाया जा सकता है। |
5. पुष्पादेवीएम. जाटियाबनामएम.एल. वधावन, एआईआर1987 एससी1748 | अवांछनीय साधनों के माध्यम से प्राप्त साक्ष्य को भी विचार में रखा जा सकता है बशर्ते कि वह सुसंगत हो। |
6. अब्दुलरज्जाकबनामस्टेट, (1969) 2 एससीसी234 | खोजी कुत्ते की मदद से तथ्यों की खोज वैज्ञानिक साक्ष्य है। |
7. कूनांबनामउड़ीसाराज्य, (2018) 1 एससीसी296 | अभिव्यक्ति 'साबित', 'नासाबित', 'साबित नहीं हुआ' साक्ष्य के मानक के दृष्टिकोण से, अर्थात् विवेकपूर्ण मनुष्य के दृष्टिकोण से परिस्थितियों के अस्तित्व या अंनस्तित्वा के बारे में मानक को निर्धारित करता है, इतना कि, विचार को अपनाते हुए 'सबूत' को मापने के लिए एक उपयुक्त ठोस मानक के रूप में आवश्यकता, पूर्ण प्रभाव की संभाव्यता या असंभाव्यता की परिस्थितियों को दिया जाना है। |
8. म्युनिसिपलकॉर्पोरेशनदिल्लीबनामजगननाथअशोककुमार, एआईआर1987 एससी2316 | मध्यस्थों को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए लेकिन वे साक्ष्यों की विधि से बाध्य नहीं होते हैं। |
9. गणेशके. गुलवेबनाममहाराष्ट्रराज्य, एआईआर2002 एससी3068 | यह जानने के लिए साक्ष्य की विवेचना की जानी चाहिए कि इसका कौन सा हिस्सा वस्तु की सही और सही स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। यह अनाज को भूसे के ढेर से अलग करने (Separating grain from the Chaff) जैसा कृत्य है। |
10. आशीषबाथमबनाममध्यप्रदेशराज्य, (2002) 7 एससीसी317 | सिविल मामलों में एक विषय (Matter) साबित होना तब कहां जाता है, जब संभाव्यता का संतुलन बनता है, लेकिन आपराधिक मामलों में न्यायालय को उचित संदेह से परे साक्ष्य की आवश्यकता होती है। |
11. रॉनीबनाममहाराष्ट्रराज्य, (1998) 3 एससीसी625 | अन्य अपराधों के अन्वेषण में प्राप्त साक्ष्य भी किसी दूसरे मामले में अच्छे साक्ष्य का निर्माण कर सकते हैं बशर्ते वह सुसंगत हो। |
12. बैनबनामव्हाइटरैवेनएंडफर्नेसजंक्शन, (1850) 3 एचएलसी1 | विधिक साक्ष्य विधि एक देशीय विधि (Lex Fori) है जो न्यायालयों को शासित करती है। |
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सुसंगततथ्य (Relevant Fact) | |
| 13. बसंतीबनामहिमाचलप्रदेशराज्य, (1987) 3 एससीसी227 | न्यायालय ने कहा कि जब हत्या के तुरंत बाद, हत्या के आरोपी व्यक्ति ने मृतक की अनुपस्थिति का वर्णन यह कह कर किया कि वह गांव छोड़ चुका था, तो न्यायालय ने उस कथन को एक ही संव्यवहार के भााग के रूप में माना और इस तरह वह सुसंगत है। |
| 14. आरबनामफोस्टर, (1834) 6 सीएंडपी35 | साक्षियों ने केवल तेज रफ्तार वाहन को देखा था न कि दुर्घटना को। घायल व्यक्ति ने दुर्घटना की प्रकृति बताई। उन्हें इस बात का साक्ष्य देने की अनुमति दी गई कि मृतक ने क्या कहा क्योंकि यह उसी संव्यवहार (res gestae) का भाग था। |
15. जी. विजयवर्धनरावबनामआंध्रप्रदेशराज्य, एआईआर1996 एससी2971 | एक ही संव्यवहार का एक भाग होने के लिए एक कथन को नैसर्गिक होना चाहिए और तथ्य के साथ समसामयिक होना चाहिए। यदि कृत्य समाप्त होने के बाद कथन कारित किया गया है और कथन देने वाले साक्षी के पास विचार या परावर्तन के लिए समय है तो यह प्रासंगिक नहीं है। |
16. गेनतेलारावबनामआंध्रप्रदेशराज्य, (1996) 6 एससीसी241 | तथ्य जो एक ही संव्यवहार के भाग हों (Doctrine of Res Gestae) का सिद्धांत सामान्य सिद्धांत का एक अपवाद है कि अनुश्रुत साक्ष्य (Hearsay Evidence) को सबूत के रूप में स्वीकार नहीं करता हैं। धारा 6 के तहत ग्राह्य कुछ तथ्यों को स्वीकार करने का औचित्य या तथ्यों की ग्राह्यता विवाद्यक तथ्यों के संबंध में इस तरह के कथनों या तथ्यों की सहजता और स्पष्टता के कारण है। |
17. सुखरबनामउत्तरप्रदेशराज्य, (1999) 9 एससीसी507 | धारा 6 सामान्य सिद्धान्त का एक अपवाद है कि अनुश्रुत साक्ष्य ग्राह्य नहीं है। धारा 6 के प्रावधान के भीतर अनुश्रुत साक्ष्य के प्रयोग के लिए यह स्थापित किया जाना चाहिए कि अधिनियम विवाद्यक तथ्य के साथ समसामयिक था और दोनों के मध्य कोई अंतराल नहीं होना चाहिए जो छल प्रवंचना का अवसर दे सके। |
18. रामलोचनबनामपश्चिमबंगालराज्य, एआईआर1963 एससी1074 | मानव शरीर के कंकाल के ऊपर मिलान के लिए रखी गयी मृतक की तस्वीर यह साबित करने के लिए ग्राह्य थी कि कंकाल मृतक का था। |
19. पम्मीबनाममध्यप्रदेशसरकार, (1998) 6 एससीसी609;
जदुनाथसिंहबनामउत्तरप्रदेशराज्य, एआईआर1971 एससी363 | परीक्षण पहचान परेड (Holding Test Identification) आयोजित करना अनिवार्य नहीं है। इसके आयोजन में विफलता अभियोजन पक्ष के लिए घातक नहीं है, जहां गवाह पहले से आरोपी व्यक्तियों को जान रहे थे |
20. अब्दुलवहीदखानबनामआंध्रप्रदेश, (2002) 7 एससीसी175 | यह वांछनीय है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के तुरंत बाद पहचान परेड आयोजित की जाए। |
21. हरनाथसिंहबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर1970 एससीसी1619 | पुलिस साक्षियों को सक्षम करने के उद्देश्य से पहचान परेड आयोजित करनी होती है, जो उन संपत्तियों की पहचान करने के लिए है जो अपराध के विषय हैं या उन व्यक्तियों की पहचान करना जो इसके साथ संबंध रखते हैं। पहचान परेड के निम्नलिखित दो उद्देश्य हैं:- 1. अन्वेषण अधिकारियों को संतुष्ट करने के लिए कि साक्षियों से पहले से अज्ञात कुछ व्यक्ति अपराध में शामिल थे। 2. न्यायालय के समक्ष साक्षी की गवाही को पुष्ट करने के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करना। |
22. सुरेंद्रनारायणबनामउत्तरप्रदेशराज्य, एआईआर1998 एससी3031 | शिनाख्त की परेड का आयोजन तब भी अनिवार्य नहीं है, जब इसकी मांग अभियुक्त द्वारा की जाए। अभियोजन ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं है। |
23. मलखानसिंहबनाममध्यप्रदेशराज्य, (2003) 5 एससीसी746 | शिनाख्त परेड एक कमजोर प्रकार का है। यह एक मौलिक साक्ष्य नहीं है। शिनाख्त परेड आयोजित करने में विफलता न्यायालय में शिनाख्त के साक्ष्यों को अग्राह्य नहीं करेगी। |
24. अमरनाथझाबनामनंदकिशोरसिंह, (2018) 9 एससीसी137 | शिनाख्त परेड का आयोजन (TIP) न करना अभियोजन के मामले के लिए स्वयं में घातक नहीं है, लेकिन यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालयों द्वारा विचारणीय होगा। |
25. सुखपालसिंहबनामपंजाबराज्य, (2019) 15 एससीसी622 | परिस्थितिजन्य साक्ष्य के एक मामले में हेतुक स्थापित करने के लिए अभियोजन पक्ष की अक्षमता हमेशा अभियोजन के मामले के लिए संघातिक नहीं होती है, यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया था। |
26. जयंतीभाईभेंकरभाईबनामगुजरातराज्य, (2002) 8 एससीसी165 | अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक (Plea of alibi) धारा 11 के अंतर्गत साक्ष्य का एक नियम है। अपराध साबित करने का भार अभियोजन पक्ष पर है और यह केवल इस तथ्य से कम नहीं किया जाएगा कि अभियुक्त ने अन्यत्र उपस्थिति के अभिवाक् लिया था। अभियुक्त द्वारा लिया गया अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् पर केवल तभी विचार करने की आवश्यकता है जब अभियोजन के भार को संतोषजनक ढंग से उन्मुक्ति दे दी गई हो। |
27. दूधनाथपांडेयबनामउत्तरप्रदेशराज्य, (1981) 2 एससीसी166 | अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् (plea of alibi) यह दर्शाता है कि आरोपी व्यक्ति घटना स्थल के बजाय किसी अन्य स्थान पर मौजूद था जिसका साक्ष्य उसके पास मौजूद है। |
28. दसारीसिवाप्रसादरेड्डीबनामपब्लिकप्रॉसिक्यूटर, उच्चन्यायालयआन्ध्रप्रदेश, एआईआर2004 एससी4383 | अभियुक्तों की ओर से अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् स्थापित करने में विफलता अभियोजन की सहायता नहीं करता है। इस प्रकार, अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् स्थापित करने के लिए अभियुक्त की ओर से विफलता इस निष्कर्ष को जन्म नहीं देगी कि अभियुक्त अपराध के स्थान पर मौजूद था। |
29. केहरसिंहबनामदिल्लीप्रशासन, एआईआर1980 एससी1883 | धारा 10 को प्रवर्तन में लाने के लिए षडयंत्र का केवल प्रथम दृष्टया मामला स्थापित किया जाना जरूरी होता है। |
30. बद्रीरायबनामबिहारराज्य, एआईआर1958 एससी953 | धारा 10 को अपराध की प्रकृति के कारण, षड्यंत्रकारियों के पूरे समूह के विरुद्ध सह षड्यंत्रकारियों के कृत्यों / कथनों पर लागू करने के लिए अधिनियमित किया गया है। |
31. सार्दुलसिंहबनामबॉम्बेराज्य, एआईआर1957 एससी747 | धारा 10 में निहत सिद्धांत 'अभिकरण का सिद्धांत (Principle of Agency) पर आधारित है। यह आपराधिक मामलों में अभिकरण के सिद्धांत को उस अवधि के भीतर षड्यंत्रकारियों के कृत्यों के लिए निर्धारित करता है, जिसके दौरान यह कहा जा सकता है कि कृत्य उनके सामान्य आशय के संदर्भ में थे। |
32. मिर्ज़ाअकबरबनामबादशाह (King Emperor), एआईआर1940 पीसी176 | धारा 10 के तहत 'सामान्य आशय' शब्द उस समय मौजूद सामान्य आशय को दर्शाता है जब कोई भी कार्य अथवा कथन उनमे से किसी एक द्वारा किया गया, किया गया या लिखा गया हो, जबकि षडयंत्र वहां सामान्य आशय की उपस्थिति में साक्ष्य के रूप में सुसंगत थी। सामान्य आशय या षडयंत्र के समाप्ति के बाद कोई कथन, वृत्तांत या संस्वीकृति, धारा 10 के तहत ग्राह्य नहीं है। |
33. सीबीआईबनामवी.सी. शुक्ला, एआईआर1998 एससी1406 | सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति को दूसरों के कृत्यों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है, जब तक कि उन्हें उसके द्वारा उकसाया या उसके ज्ञान या सहमति से नहीं किया जाता है। धारा 10 इस नियम का अपवाद प्रस्तुत करता है कि एक मूलतः प्रकट कृत्य, जो किन्हीं षड्यंत्रकारियों में से एक द्वारा किया गया हो, अभिकरण के सिद्धांतों को लागू करने के लिए पर्याप्त है |
34. साईलसिंहबनामबॉम्बेराज्य, एआईआर1957 एसी747 | धारा 10 के तहत अंतर्निहित साक्ष्य 'अभिकरण का सिद्धांत' (theory of agency) है। |
35. आर.एम. मलकानीबनाममहाराष्ट्रराज्यएआईआर1973 एससी 157 | टेप रिकॉर्डेड वार्तालाप ग्राह्य है बशर्ते कि वह विवाद्यक मामले से सुसंगत हो, उससे आवाज की पहचान हो एवं टेप रिकॉर्ड को मिटाने की संभावना को खत्म करके वार्तालाप की सटीकता सिद्ध की गई हो। |
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सुसंगतता/ग्राह्यता (Relevancy & Admissibility) | |
36. रामबिहारीयादवबनामबिहारराज्य, (1994) 4 एससीसी517 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि 'सुसंगतता' और 'ग्राह्यता' शब्द समव्यापी या परस्पर विनिमय करने योग्य नहीं हैं। उनका विधिक प्रसंग अलग हैं। सभी ग्राह्य साक्ष्य आमतौर पर सुसंगत होते हैं, लेकिन सभी सुसंगत साक्ष्य ग्राह्य नहीं होते हैं |
37. गोरखपुरकलेक्टरबनामपलकधारीसिंह (1890) आईएलआर12 ऑल1 | जहां एक न्यायाधीश किसी विशेष साक्ष्य की ग्राह्यता के बारे में संदेह में है, उसे अग्राह्यता के बजाय ग्राह्यता के पक्ष में निर्णय करना चाहिए। |
38. साहूबनामउत्तरप्रदेशराज्य, एआईआर1966 एससी40 | साक्ष्य की ग्राह्यता और उसके पुख्ता/मुख्य होने के बीच एक अंतर है। न्यायालय को दोहरे परीक्षण को लागू करना चाहिए- पहला, क्या संस्वीकृति पूरी तरह से स्वैच्छिक थी और दूसरा, यदि ऐसा है तो क्या वाह सत्य और विश्वसनीय है। |
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प्रत्यक्षएवंपरिस्थितिजन्यसाक्ष्य | |
39. ऋषिपालबनामउत्तराखंडराज्य, एआईआर2013 एससी3641;
कूनाबनामओडिशाराज्य, (2018) 1 एससीसी296 | परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामले में हेतु महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। |
40. उत्तरप्रदेशराज्यबनामरवीन्द्रप्रकाशमित्तल, एआईआर1992 एससी2045;
गणपतसिंहबनाममध्यप्रदेशराज्य, (2017) 16 एससीसी353 | कभी-कभी प्रत्यक्ष साक्ष्य प्राप्त करना बहुत कठिन होता है। ऐसे मामलों में न्यायालय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर भरोसा करते हैं। वे मामले से संबंधित परिस्थितियों से साक्ष्य प्राप्त करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखते हुए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की विवेचना करनी चाहिए- 1. जिन परिस्थितियों से निष्कर्ष निकाला गया है, उन्हें पूरी तरह से स्थापित किया जाना चाहिए। 2. परिस्थितियाँ निश्चायक प्रकृति की होनी चाहिए। 3. स्थापित किए गए सभी तथ्य केवल अपराध की परिकल्पना और निर्दोषिता के साथ सुसंगत होने के अनुरूप होना चाहिए। 4. परिस्थितियों को एक नैतिक निश्चितता के लिए, अभियुक्त के सिवाय किसी भी व्यक्ति की संभावना को बहिष्करण करना चाहिए। |
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स्वीकृतिएवंसंस्वीकृति | |
41. कौशलटोप्पाबनामझारखंडराज्य, (2019) 13 एस.सी.सी. 676 | एक न्यायिकेतर संस्वीकृति एक कमजोर साक्ष्य है। संपोषक साक्ष्य के अभाव में उस पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। एक न्यायिकेत्तर संस्वीकृति को सह-अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य का मूल हिस्सा नहीं माना जा सकता है। |
42. दिगंबरवैष्णवबनामछत्तीसगढ़राज्य, (2019) 4 एस.सी.सी. 522 | धारा 27 के तहत प्रत्येक तथ्य की खोज ग्राह्य नहीं है केवल प्रासंगिक तथ्य की खोज ग्राह्य है। |
43. दीपकभाईजगदीशचंद्रपटेलबनामगुजरातराज्य, (2019) 16 एस.सी.सी. 547 | धारा 25 घोषणा करती है कि पुलिस कार्यालय में किए गए किसी भी संस्वीकृति को किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ साबित नहीं किया जाएगा। इस तरह की संस्वीकृति अभी भी अधिनियम की धारा 21 के तहत स्वीकृति के रूप में ग्राह्य की जा सकती है, लेकिन सी आर पी सी की धारा 162 के तहत स्वीकार्यता के वर्जन के अधीन है। |
44. भारतसिंहबनामभागीरथी, एआईआर1966 एससी405 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि स्वीकृति, ग्राह्य किये गए तथ्य के मौलिक साक्ष्य हैं और स्वीकृति जो विधिवत प्रमाणित हैं वह भी ग्राह्य है, चाहे उसे प्रस्तुत करने वाला पक्ष साक्षी के रूप में उपस्थित हों या न हो। |
45. हनुमंतनारायणबनाममध्यप्रदेशराज्य, 1975 एआईआर1083 एस.सी. | स्वीकृति का उपयोग खण्डों में नहीं किया जा सकता है। यह या तो पूर्ण रूप से स्वीकार या पूर्ण रूप से अस्वीकार किया जा सकती |
46. पकलानारायणस्वामीबनामबादशाह (Emperor), एआईआर1939 पीसी47;
पलविंदरकौरबनामपंजाबराज्य, एआईआर1952 एससी354 | 'संस्वीकृति' (confession) शब्द लॉर्ड एटकिन द्वारा परिभाषित किया गया था। पलविंदर कौर के मामले में प्रिवी काउंसिल द्वारा दी गई परिभाषा को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित किया गया था। न्यायालय ने कहा कि एक संस्वीकृति को या तो अपराध के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए या फिर किसी भी दशा में उन सभी तथ्यों को जो अपराध को गठित करते हैं।' (The court held that 'a confession must either admit in terms the offience, or at any rate substantialy all the fals which constitute the offence')। |
47. अब्दुलराशिदबनामबिहारराज्य, एआईआर2001 एससी2422 | न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि बिहार और उड़ीसा आबकारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत अभियुक्त द्वारा अधीक्षक को दी गयी संस्वीकृति को अनुचित एवं अग्राह्य माना गया क्योंकि आबकारी अधिकारी को धारा 25 के अर्थ के तहत पुलिस अधिकारी के रूप में माना गया था। |
48. अघ्नूनागेसियाबनामबिहारराज्य, एआईआर1966 एससी119 | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया कि कथन, अभियुक्त ने अपराध किया या फिर उसने कुछ जगहों पर प्रयोजन छिपाया, ग्राह्य नहीं है। केवल कथन का वही भाग ग्राह्य है जो छिपाए गए प्रयोजन के स्थान के बारे में सूचना उद्घाटित करता है। |
49. मो. इनायतुल्लाहबनाममहाराष्ट्रराज्य, एआईआर1976 एससी483 | सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देशित किया कि यह साबित करना आवश्यक है कि वस्तु को छिपाने के स्थान से खोजा गया था। यदि वस्तु एक खुली जगह पर पड़ी है, तो संभावना है कि दूसरों को इसके बारे में पता चल सकता है और यह साबित करना कठिन होगा कि अभियुक्त द्वारा प्रदान की गई जानकारी के आधार पर वस्तु की खोज की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 27 धारा 24 से 26 की अपवाद है। |
50. पांडुरंगाकल्लूपाटिलबनाममहाराष्ट्रराज्य, (2002) 2 एससीसी490 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 27, धारा 25 और 26 की अपवाद है। |
51. उत्तरप्रदेशराज्यबनामदेवमणउपाध्याय, एआईआर1960 एससी1125 | धारा 27 की संवैधानिक वैधता को धारित किया गया। |
52. निशिकांतझाबनामबिहारराज्य, एआईआर1952 एससी1033 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संस्वीकृतकारी कथन के एक भाग पर भरोसा करने और बाकी को खारिज करने में कुछ भी गलत नहीं है। जब निर्दोषकारी भाग को अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं, तो न्यायालय सदोषकारी भाग पर विश्वास कर सकता है। |
53. प्यारेलालबनामराजस्थानराज्य, एआईआर1963 एससी1094 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यदि न्यायालय संतुष्ट है कि संस्वीकृति सत्य और स्वैच्छिक रूप से की गई है तो एक प्रत्याहारी संस्वीकृति (Retracted Confession) दोषसिद्धि का आधार बन सकती है। विधि के मामले के रूप में, अगर न्यायालय संस्वीकृति की सत्यता और स्वैच्छिक प्रकृति के बारे में आश्वस्त हो तो सम्पुष्टि आवश्यक नहीं है; हालांकि प्रज्ञा (Prudence) की आवश्यकता होती है कि बिना पुष्टि के प्रत्याहारी संस्वीकृति के आधार पर कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। |
54. पंजाबराज्यबनामगुरदीपसिंह, (1999) 7 एससीसी714 | न्यायिकेत्तर संस्वीकृति साक्ष्य में ग्राह्य है और उचित मामलों में न्यायालय, इस पर भरोसा कर सकता है और अभियुक्त को दोषसिद्ध कर सकता है। |
55. कर्नाटकराज्यबनामपी. रविकुमार, (2018) 9 एससीसी614 | न्यायिकेत्तर संस्वीकृति एक कमजोर साक्ष्य है और यह अभियुक्त को दोषसिद्ध ठहराने का का आधार नहीं बन सकता है, जब तक कि अन्य मौलिक साक्ष्यों से समर्थन नहीं हो जाता है। |
56. आशीषजैनबनाममकरंदसिंह, (2019) 3 एससीसी770 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अन्वेषण अधिकारी के अनुचित दबाव और बाध्यता के तहत किए गए अनैच्छिक संस्वीकृति का कोई साक्ष्यिक मूल्य नहीं है, भले ही वह अपराध से संबंधित भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति का कारण बने। |
57. रामभरोसेशर्माबनाममहंतरामस्वरूप, (2001) 9 एससीसी471 | एक कथन जो तथ्य और विधि के मिश्रित प्रश्न पर एक स्वीकृति की प्रकृति का है, धारा 17 के तहत एक स्वीकृति के रूप में नहीं माना जा सकता है, क्योंकि केवल तथ्यों की एक स्वीकृति स्वीकृतिकर्ता को बाध्य करती है विधि के प्रश्न के लिए की गयी स्वीकृति। |
58. सत्रुचारलाविजयारामराजूबनामनिम्मकाजयाराजू, (2006) 1 एससीसी212 | जहाँ एक व्यक्ति स्वयं के पक्ष में कोई कथन करता है, बाद में वह उसके हितों के प्रतिकूल हो जाता है, तो यह एक स्वीकृति के रूप में उसके विरुद्ध साबित की जा सकती है। |
59. भारतसिंहबनामभगीरथ, एआईआर1966 एससी405 | एक स्वीकृति, स्वीकार किये गए तथ्य का एक मौलिक साक्ष्य है और विधिवत प्रमाणित एक ग्राह्य साक्ष्य है। |
60. स्टेट (राष्ट्रीयराजधानीक्षेत्र, दिल्ली) बनामनवजोतसिंधु, (2005) 11 एससीसी600 | संस्वीकृति को अत्यधिक विश्वसनीय माना जाता है क्योंकि कोई भी तर्कसंगत व्यक्ति खुद के विरुद्ध स्वीकृति नहीं करेगा जब तक कि वह स्वयं की अंतरात्मा द्वारा सत्य बताने के लिए प्रेरित न हो। |
61. पलविंदरकौरबनामपंजाबराज्य, एआईआर1952 एससी354 | संस्वीकृति या तो पूर्ण रूप से स्वीकार की जानी चाहिए या पूर्ण रूप से अस्वीकार कर दी जानी चाहिए। |
62. मोहम्मदइनायतुल्लाहबनाममहाराष्ट्रराज्य, एआईआर1976 एससी483 | सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 27 के संबंध में निम्नलिखित मत रखे – 1. अभियुक्त से प्राप्त जानकारी के परिणाम में तथ्य की प्राप्ति होनी चाहिए। 2. तथ्य की प्राप्ति को अवधारित किया जाना चाहिए 3. सूचना प्राप्त होने के समय अभियुक्त को पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिए। 4. वह जानकारी जो कि तथ्य की प्राप्ति से संबंधित है केवल वही ग्राह्य है। |
63. सीबीआईबनामवी. सी. शुक्ला, (1998) 3 एससीसी410 | स्वीकृति दूसरों के विरुद्ध एक साक्ष्य नहीं है। एक स्वीकृति दूसरों के विरुद्ध साक्ष्य तभी बन सकती है यदि वह एक संस्वीकृति के रूप हो। तब इसका उपयोग सह-अभियुक्त के संस्वीकृति के रूप में धारा 10 के तहत या धारा 30 के तहत किया जा सकता है। |
64. विश्वनाथप्रसादबनामद्वारकाप्रसाद, एआईआर1974 एससी117 | प्रथम कथन देने वाला पक्ष तथा वह साक्षी जिसकी परीक्षा होती है और कथन को उसके विरुद्ध प्रयोग किया जाता है, इन दोनों में अंतर है। पहले मामले में एक पक्ष द्वारा दी गई स्वीकृति अगर धारा 21 में प्रदत्त आवश्यकताओं को पूरा करती है तो वह एक मौलिक साक्ष्य के रूप में मानी जाएगी। दूसरे मामले में प्रथम कथन, साक्षी की विश्वसनीयता को खंडित करने के लिए प्रयोग किया जाता है और मौलिक साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं होगी। |
65. जयसलीनबनामतमिलनाडुराज्य, एआईआर2009 एससी1901 | संस्वीकृति को पूर्ण रूप से स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जाना चाहिए तथा न्यायालय सदोषकारी भाग को स्वीकार करने तथा निर्दोषकारी भाग को अस्वीकार करने के लिए सक्षम नहीं है। परंतु उन स्थितियों में जहां निर्दोषकारी भाग न केवल स्वाभाविक रूप से अनुचित है, बल्कि यह अन्य साक्ष्यों द्वारा विरोधाभासी है। न्यायालय सदोषकारी भाग को स्वीकार कर सकता है। |
66. बालकिशनबनाममहाराष्ट्रराज्य, एआईआर1981 एससी379 | एक अधिकारी पुलिस अधिकारी है या नहीं यह निर्धारित करने के लिए प्राथमिक परीक्षण यह है कि क्या संबंधित अधिकारी (विशेष अधिनियम के तहत) को अन्वेषण के लिए सभी शक्तियां प्रदान की गई हैं या नहीं, जिसमें चार्जशीट प्रस्तुत करके अभियोजन शुरू करने की शक्ति भी शामिल है। |
67. राजकुमारकरवालबनामभारतसंघ, एआईआर1991 एससी45 | पुलिस अधिकारी की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसके पास न केवल अन्वेषण की शक्ति होनी चाहिए, बल्कि आरोपी के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज करने की शक्ति होनी चाहिए। जब तक उसके पास आरोप का अन्वेषण करने और उसे आरोप-पत्र दाखिल करने की शक्ति नहीं है, तब तक उसे धारा 25 के अर्थों में उसे एक पुलिस अधिकारी नहीं कहा जा सकता है |
68. मोहम्मददस्तागीरीबनामराज्य, एआईआर1960 एससी756 | धारा 27 के तहत यह आवश्यक नहीं है कि जब कथन कारित किया गया था तब वह अभियुक्त था, उसे अभियुक्त बनाने के लिए यह पर्याप्त है कि इस तरह के कथन को न्यायालय में साबित किया जाए। |
69. हिमाचलप्रदेशराज्यबनामजीतसिंह, एआईआर1999 एससी1293 | धारा 27 के तहत कथन केवल इसलिए अग्राह्य नहीं बन जाते हैं क्योंकि उनकी प्राप्ति किसी ऐसी जगह से की गई है जो दूसरों के लिए खुली या सुलभ है। वस्तु को उन स्थानों पर भी छुपाया जा सकता है जो दूसरों के लिए खुले और सुलभ हैं। महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या वस्तु दूसरों को सामान्य रूप से दिखाई दे रही थी, यदि नहीं तो यह महत्त्वहीन (Immaterial) है कि वह स्थान दूसरों के लिए सुलभ था या नहीं। |
70. पुलुकुरीकोट्टायाबनामएंपरर, एआईआर1947 पीसी67 | 'तथ्य की खोज' का अर्थ है वह स्थान जहाँ से वस्तु को प्राप्त किया गया तथा अभियुक्त का इस विषय में ज्ञान था। इस जानकारी का साक्ष्य में ग्राह्य होना अनुमन्य है। यह उस जानकारी के केवल उस हिस्से तक सीमित है, जो 'तथ्य की खोज' से संबंधित है। |
71. केहरसिंहबनामराज्य, एआईआर1988 एससी1883 | मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज की गई संस्वीकृति साक्ष्य में ग्राह्य होगी। यदि यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के प्रावधानों के अनुपालन में दर्ज की गई है। यदि संस्वीकृति दर्ज करने में कोई अनियमितता है, तो यह तभी ग्राह्य होगी, जब अनियमितताएं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 463 के तहत सुधार करने योग्य हों। |
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मृत्युकालिककथन (Dying Declaration) | |
72. उकारामबनामराजस्थानराज्य, एआईआर2001 एससी1814 | कोई भी व्यक्ति अपनी जिह्वा पर झूठ रखकर नहीं मरेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि आसन्न मरण की भावना मनुष्य के मन में वैसी बी भावना पैदा करती है जैसी शपथ से बाध्य एक पुण्य व्यक्ति के मन में होती है और उस व्यक्ति के झूठ बोलने की संभावना पूरी तरह से नहीं होती है। |
73. पाकलानारायणस्वामीबनामएंपरर, एआईआर1939 पीसी47 | न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मृतक ने अपनी पत्नी से जो कथन किया था कि वह अभियुक्त के पास उससे पैसे लेने के लिए जा रहा था, धारा 32 (1) के तहत ग्राह्य है। |
74. कौशलरावबनामबॉम्बेराज्य, (1958) एससीआर552 | यह न तो विधि का शासन होगा और न ही प्रज्ञा का, जब यह कहा जाए कि मृत्युकालिक कथन दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बन संकता जब तक कि इसकी स्वतंत्र साक्ष्य द्वारा संपुष्टि न की जाए। एक सत्य और स्वैच्छिक कथन के लिए किसी संपुष्टि की आवश्यकता नहीं है। |
75. संपतबब्सोकालेबनाममहाराष्ट्रराज्य, (2019)4 एससीसी739 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि हालांकि दोषसिद्धि पूरी तरह से मृत्युकालिक कथन पर आधारित हो सकती है, लेकिन उस स्थिति में जब यह संदेह हो कि पीड़ित अच्छी मनोस्थिति में था या नहीं, पुष्टिकारक साक्ष्य की आवश्यकता हो सकती है। |
76. क्वीनएंप्रेसबनामअब्दुल्लाह, (1885) 7 11 385 एफबी | यह अभिनिर्धारित किया गया कि संकेतों और सर हिला के दिया गया मृत्युकालिक कथन भी सुसंगत है। |
77. सुरेशचन्द्रजेनाबनामपश्चिमबंगालराज्य, (2017)16 एससीसी466 | ऐसा कोई पूर्ण नियम नहीं है कि मृत्युकालिक कथन दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बन सकता है जब तक कि पुष्टि की आवश्यकता बताने वाला नियम केवल विवेक संगत (Prudance) नियम है। |
78. भद्रगिरिवेंकटरविबनामपब्लिकप्रॉसिक्यूटर, 2013 | यदि मृत्युकालिक कथन स्वैच्छिक, विश्वसनीय और अच्छी मानसिक स्थिति में किया जाया है, तो इस पर बिना किस किया जा सकता है। किसी भी विसंगति की स्थिति में, इस पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं होगा। |
79. संजयबनाममहाराष्ट्रराज्य, (2007)9 एससीसी148 | यदि दो मृत्युकालिक कथनों में स्पष्ट विसंगतियां हैं, तो अभियुक्त को दोषी ठहराना असुरक्षित होगा। |
80. के. रामचंदरेड्डीबनामपब्लिकप्रॉसिक्यूटर, (1976)3 एससीसी104 | जब घायल व्यक्ति पहले प्राथमिकी दर्ज कराता है उसके बाद उसकी मृत्यु हो जाती है तो प्राथमिकी को मृत्युकालिक सुसंगत माना जाएगा। |
81. कौशलरावबनामबॉम्बेराज्य, एआईआर1958 एससी22 | विधि का यह कोई पूर्ण नियम नहीं है कि मृत्युकालिक कथन दोषसिद्धि (conviction) साक्षी का एकमात्र आधार है जब तक कि उसकी संपुष्टि न कर ली जाए। यह किसी भी अन्य साक्ष्य की तुलना में एक कमजोर प्रकार का साथ किसी भी अन्य साक्ष्य के रूप में उसी पायदान पर खड़ा है जिसपर अन्य साक्ष्य हैं। |
82. कुसाबनामओडिशाराज्य, एआईआर1980 एससी559 | जब एक मृत्युकालिक कथन को सत्य तथा संगत माना जाता है तब दोषसिद्धि करने के लिए इस पर भरोसा किया जा ही इसकी कोई संपुष्टि न हो। |
83. लक्ष्मणबनाममहाराष्ट्रराज्य, (2019)11 एससीसी512 | मृत्युकालिक कथन मौखिक या लिखित और संचार के किसी भी पर्याप्त तरीके से हो सकता है, यह शब्दों द्वारा या अन्य से पर्याप्त होगा, बशर्ते कि संकेत निश्चित और सकारात्मक हों। |
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विशेषज्ञसाक्ष्य (Expert Evidence) | |
84. बालकृष्णदासअग्रवालबनामराधादेवीएवंअन्य, एआईआर1989 एएलएल133 | एक विशेषज्ञ ऐसा व्यक्ति है जिसने अपने प्रशिक्षण और अनुभव से राय व्यक्त करने की ऐसी क्षमता हासिल कर ली है जो साक्षी के पास नहीं है। किसी विशेषज्ञ के साक्ष्य ऐसे साक्ष्य होते हैं जो विशेषज्ञता और अनुभव पर आधारित होते हैं। |
85. अब्दुलरहमानबनाममैसूरराज्य, (1972) जीएलजे407 | सोने की शुद्धता के प्रश्न में एक पेशेवर सुनार की राय को एक विशेषज्ञ की राय के रूप में प्रासंगिक माना गया, हाट पास कोई औपचारिक योग्यता नहीं थी। उसकी एकमात्र योग्यता अनुभव था। |
86. एस. गोपालारेड्डीबनामआंध्रप्रदेशराज्य, एआईआर1996 एससी2184 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक विशेषज्ञ का साक्ष्य कमजोर प्रकार का साक्ष्य है। न्यायालय इसे निश्चायक हैं और इसलिए, स्वतंत्र और विश्वसनीय संपुष्टि के बिना इस पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है। |
87. दर्शनसिंहबनामहरियाणाराज्य, एआईआर1997 एससी364 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जहां चश्मदीद गवाह (प्रत्यक्ष साक्षी) एवं चोट कैसे लगी के बीच असंगतता है, तब चिकित्सक के साक्ष्य प्रत्यक्ष साक्षी साक्ष्य को निःसंदेह अधिभावी (override) नहीं कर सकता है। |
88. फखरुद्दीनबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर1967 एससी1326 | यह अभिनिर्धारित किया गया कि हस्तलेख ऐसे साक्षी के साक्ष्य से साबित हो सकती है जिसकी उपस्थिति में लेखन किया गया था और यह प्रत्यक्ष साक्ष्य होगा और यदि यह उपलब्ध है तो किसी अन्य प्रकार के साक्ष्य को अनावश्यक माना जाएगा। |
89. लतेशबनाममहाराष्ट्रराज्य, (2018)3 एससीसी66 | मौखिक साक्ष्य चिकित्सकीय साक्ष्य पर प्रधानता (Precedence) रखते हैं. जब तक कि चिकित्सकीय साक्ष्य ऐसी घटना की किसी भी संभावना का पूरी तरह से खंडन नहीं करता। |
90. आशीषजैनबनाममकरंदसिंह, (2019)3 एससीसी770 | सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि केवल एक मैजिस्ट्रेट के आदेश की अनुपस्थित होने के कारण जो कि पुलिस को अभियुक्त की अंगुलिचिह्न प्राप्त करने के लिए अधिकृत करे, यह नहीं माना जा सकता कि अंगुलिचिह्न साक्ष्य अवैध रूप से प्राप्त किया गया था। |
91. हिमाचलप्रदेशराज्यबनामजयलालएवंअन्य, (1999)7 एससीसी280 | एक साक्षी के साक्ष्य को एक विशेषज्ञ के रूप में लाने के लिए यह दिखाना होगा कि उसने विषय का एक विशेष अध्ययन किया है या एक विशेष अनुभव प्राप्त किया है या दूसरे शब्दों में, वह कुशल है और उसे विषय का पर्याप्त ज्ञान है। |
92. मुरारीलालबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर1980 एससी531 | विधि या प्रज्ञा (Prudence) का कोई ऐसा नियम नहीं है जो कहता है कि विशेषज्ञ की राय पर तंब तक कभी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए जब तक कि उसकी संपुष्टि न हो। उपयुक्त मामलों में संपुष्टि की मांग की जानी चाहिए। |
93. विलायतखानबनामराज्य, एआईआर1962 एससी122 | विशेषज्ञ की राय पर तब विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, जब वह प्रत्यक्ष साक्ष्य के विरोधाभास में हो। |
94. मुशीरखानबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर2010 एससी762 | अंगुलिचिह्न विशेषज्ञ का साक्ष्य कोई मौलिक साक्ष्य नहीं हैं। इसका उपयोग केवल अभिलिखत मौलिक साक्ष्यों की कुछ वस्तुओं की संपुष्टि करने के गए किया जा सकता है। |
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दस्तावेजीएवंमौखिकसाक्ष्य | |
95. पीगोपालकृष्णनउर्फदिलीपबनामकेरलराज्यएवंअन्य, 2019 सर्वोच्चन्यायालय (एससी) 1306 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक अपराध के संबंध में एक मेमोरीकार्ड की सामग्री एक 'दस्तावेज' है न कि कोई 'भौतिक वस्तु'। |
96. महाराष्ट्रराज्यबनामप्रफुल्लबी. देसाई, (2003)4 एससीसी601 | साक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है। इसमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग शामिल होगी। |
97. रूपकुमारबनाममोहनथडानी, (2003)6 एससीसी595 | धारा 91 और 92 लिखित अभिलेखों के मामले में एकीकरण के न्यायिक कार्य की मान्यता पर आधारित (Section 91 and 92 are based on recognibion of the jural act of integration in case of written in struments) हैं और एक संविदा स्थापित करने की मांग करने वाले तीसरे पक्ष पर भी लागू होते हैं। नोट : साक्ष्य अधिनियम की धारा 91 एवं 92 "लिखत को लिखत के द्वारा ही साबित किया जा सकता है" की अवधारणा पर आधारित है। |
98. आर. जानकीरमनबनामराज्य, (2006)1 एससीसी697 | धारा 92 तब लागू होती है जब किसी मामले में लिखत के पक्षकार अपनी शर्तों का नासाबित करना चाहता है। यह तब लागू नहीं होता है जब कोई व्यक्ति, जिसमें लिखत मामले के पक्षकार सम्मिलित हैं, यह स्थापित करना चाहता है कि मामला स्वयं दिखावटी एवं काल्पनिक है। |
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उपधारणाएवंसाक्ष्यकाभार | |
99. आंध्रप्रदेशराज्यबनामवासुदेवराव, (2004)9 एससीसी319 | उपधारणा दूसरे ज्ञात या साबित तथ्यों से निगमित तथ्यों का अनुमान हो (A presumption is an inference of fact drawn from other known or roved facts)। इसका तात्पर्य यह है, कि यह एक विधि का नियम है कि न्यायालय और न्यायाधीश एक विशेष तथ्य से एक विशेष निष्कर्ष निकालेंगे। |
100. सेठूबनामपलानी, (1926)50 एमएलजे453 | धारा 112 के तहत उपधारणा समान बल के साथ लागू होती है, यहां तक कि उन मामलों में भी जहां बच्चा शादी के कुछ दिनों के भीतर पैदा हो गया हो। नोट : धारा-112 - विवाहित स्थिति के दौरान में जन्म होना धर्मजत्व का निश्चायक सबूत है : यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का जन्म उसकी माता और किसी पुरुष के बीच विधिमान्य विवाह के कायम रहते हुए, या उसका विघटन होने के उपरांत माता के अविवाहित रहते हुए दो सो अस्सी दिन के भीतर हुआ था, इस बात का निश्चायक सबूत होगा कि वह उस पुरुष का धर्मज पुत्र है, जब तक कि यह दर्शित न किया जा सके कि विवाह के पक्षकारों की परस्पर पहुंच ऐसे किसी समय नहीं थी जब उसका गर्भाधान किया जा सकता था। |
101. गौतमकुंडूबनामपश्चिमबंगालराज्य, एआईआर1993 एससी2295 | सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 112 के तहत उपधारणा को खंडित करने का एकमात्र तरीका परस्पर पहुंच के अभाव को साबित करना है तथा बायोमेडिकल साक्ष्य जैसे रक्त परीक्षण, डीएनए परीक्षण आदि को साबित करने की अनुमति नहीं है। |
102. श्रीमतीकांतिदेवीबनामपोशीराम, एआईआर2001 एससी2226 | यह अभिनिर्धारित किया गया है कि धारा 112 के तहत एक बार धर्मजता का निश्चायक सबूत प्रस्तुत कर दिया जाए, उसके बाद वास्तविक डीएनए परीक्षण द्वारा भी उसका खंडन नहीं किया जा सकता है। यदि गर्भधारण के समय में पति-पत्नी एक साथ रह रहे थे, लेकिन डीएनए परीक्षणों से पता चलता है कि बच्चा पति से पैदा नहीं हुआ था, तो विधि की निश्चायकता अखण्डनीय होगी। |
103. नंदलालवासुदेवबडबाईकबनामलतानंदलालबडवाईक (2014) 4 एससीसी (क्रि.) 65 | सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 112 के तहत निश्चायक सबूत को सामान्य रूप से किसी भी अन्य तथ्य से खंडित नहीं किया जा सकता है। हालांकि डीएनए परीक्षण एक विशुद्ध विज्ञान है और एक बार डीएनए परीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध होने के बाद, धारा 112 की उपधारणा को फिर से विखंडित किया जा सकता है। |
104. रबीन्द्रकुमारडेबनामओडिशाराज्य, (1976)4 एससीसी233 | साक्ष्य अधिनियम इस पर विचार नहीं करता है कि अभियुक्त अभियोजन पक्ष की तरह अपने मामले को उसी सख्ती के साथ साबित करे। यह पर्याप्त है कि वह संभावनाओं के प्रसार के मानक (preponderance of probabilities) द्वारा धारा 105 के तहत अपने मामले को साबित करे। |
105. संजयदत्तबनामराज्य, (1994) 5 एससीसी410 | जब वैधानिक प्रावधान द्वारा निर्दोषिता की उपधारणा उलट जाती है. तो साक्ष्य का भार उतना वजनी नहीं होना चाहिए जितना अभियोजन पक्ष के लिए होता है। |
106. पी. नरसिम्हारावबनामआंध्रप्रदेशराज्य, एआईआर2001 एससी318 | साक्ष्य अधिनियम की धारा अथ प्रथायालय को उसमें निर्दिष्ट तरीके से कुछ तथ्यों के अस्तित्व को उपधारित करने के लिए पूर्ण विवेकाधिकार प्रदान करती है। वास्तव में अस्तित्व का अवधारण करते समय न्यायालय को बौद्धिक तर्क की प्रक्रिया को लागू करने की आवश्यकता होती है जैसा की एक प्रज्ञाशील (prudent) व्यक्ति समान परिस्थितियों में करेगा। |
107. नवनीथाकृष्णनबनामराज्य, (2018) 16 एससीसी161 | यह एक अवधारित विधिक स्थिति है जो विधिक अवधारणा है कि वह व्यक्ति, जिसे अंतिम बार मृतक के साथ देखा गया था, उसने ही मृतक को मार दिया होगा। यह साबित करने के लिए कि अभियुक्त ने अपराध नहीं किया है, साबित करने का भार अभियुक्त पर है। हालांकि, इस तरह के साक्ष्य अकेले उचित संदेह से परे अभियुक्तों के अपराध को सिद्ध करने के भार का निर्वहन नहीं कर सकते हैं और इनकी संपुष्टि की जानी चाहिए। |
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विशेषाधिकृतसंसूचना | |
108. कुलविंदरसिंहएवंएकअन्यबनामपंजाबराज्य, 2015 (3) सी.सी., एस.सी. 1440 (एस.सी.) | जब शासकीय साक्षियों का साक्ष्य विश्वसनीय और विश्वास करने योग्य है, तब उनके साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि आधारित न करने का कोई कारण ही नहीं। |
109. भारतसंघबनामओरिएंटइंजीनियरिंगएंडकमर्शियलकंपनी, (1978)1 एससीसी10 | धारा 121 के अंतर्गत विशेषाधिकार एक मध्यस्थ के लिए भी उपलब्ध हैं। |
110. रामभरोसेबनामउत्तरप्रदेशराज्य, एआईआर1954 एससी704 | न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 122 के अंतर्गत संसूचना के अलावा पति या पत्नी के आचरण के कार्य संरक्षित नहीं हैं। एक पत्नी इस बात की साक्ष्य दे सकती है, कि उसके पति ने किसी निश्चित अवसर पर क्या किया, हालाँकि वह यही नहीं बता सकती कि उस अवसर पर उसने क्या कहा। |
111. क्वीनइंपरेसबनामडोनोघ, आईएलआर (1899)22 मेंड1 | प्रश्न यह था कि क्या घर की तलाशी के दौरान पुलिस द्वारा बरामद अपनी पत्नी को आरोपी द्वारा भेजी गयी एक संसूचना ग्राह्य है? यह अभिनिर्धारित किया गया कि इस पर भरोसा किया जा सकता है क्योंकि मामले में पत्नी का परीक्षा नहीं की जा रही थी और न तो इसका खुलासा करने के लिए उसे विवश किया गया था और न ही ऐसा करने की अनुमति दी गई थी। |
112. एम. सी. वर्गीजबनामटी. जे. पोन्नन, एआईआर1970 एससी1876 | यह माना जाता था कि धारा 122 के तहत निषेध केवल पति-पत्नी पर लागू होती है, न कि तीसरे व्यक्ति पर। इसके अलावा धारा 122 के तहत निषेध शादी के विघटन के बाद भी जारी रहेगी (Further the bar under Section 122 would even continue after dissalution of marriage) साक्ष्य देने के समय की स्थिति के बजाय संसूचना के समय की स्थिति को देखा जाना चाहिए। |
113. उत्तरप्रदेशराज्यबनामराजनारायण, एआईआर1975 एससी865 | धारा 123 लोक-कल्याण सर्वोपरि विधि है (Salus populi est suprema lex) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि लोक कल्याण सर्वोच्च विधि है। धारा 123 के संबंध में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि विधि की नीव सार्वजनिक हित पर आधारित है। सार्वजनिक हित जो कि साक्ष्य की माँग करता है उसे जनहित के विरुद्ध तौला जाना चाहिए। |
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गवाह/साक्षी (Witnesses) | |
114. मोहम्मदसुगलबनामदकिंग, एआईआर1946 पीसी3 | यह अभिनिर्धारित किया गया कि एक बच्चा भी एक सक्षम साक्षी है, अगर वह उससे पूछे गए प्रश्न को समझ सकता है और तर्कसंगत उत्तर दे सकता है, भले ही वह शपथ का अर्थ अथवा इसकी मंशा न समझता हो। |
115. भगवानसिंहबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर2003 एससी1088 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि बच्चे के साक्ष्य का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है क्योंकि वह यातना का एक आसान शिकार है। इसलिए, न्यायालय हमेशा अन्य साक्ष्यों से उसके साक्ष्य की पर्याप्त संपुष्टि की तलाश करती है। |
116. रतनसिंहदलसुखभाईनायकबनामगुजरातराज्य, (2004)1 एससीसी64 | कम आयु के बच्चे को साक्ष्य देने की अनुमति दी जा सकती है अगर उसके पास प्रश्नों को समझने और उसका तर्कसंगत उत्तर देने की बौद्धिक क्षमता है। |
117. कृष्णपिल्लईबनामकेरलराज्य, एआईआर1981 एससी1237 | एक हितबद्ध साक्षी के साक्ष्य को सावधानी से जांचना चाहिए। हालाँकि, जहाँ इस तरह की जाँच विश्वसनीयता स्थापित करती है, वहां ऐसे साक्ष्यों को खारिज नहीं किया जाना चाहिए। |
118. दगडूबनाममहाराष्ट्रराज्य, एआईआर1997 एससी1579 | सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 133 और धारा 114 के दृष्टांत (ख) के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं है। दृष्टांत 'हो सकता है' (May) शब्द का उपयोग करता है, इसलिए विवेकाधिकार न्यायालय के पास है। न्यायालय को यह देखने के लिए मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर गौर करना होगा कि क्या सहअपराधी विश्वसनीय है या नहीं। |
119. रबिंदरकुमारडेबनामओडिशाराज्य, एआईआर1977 एससी170 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि किसी सहअपराधी के पूरे साक्ष्य को अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए और न ही ऐसे साक्ष्य को पूरी तरह से अविश्वसनीय साक्षी माना जा सकता है। न्यायालय साक्ष्य के उस भाग पर भरोसा कर सकती है जो विश्वास प्रेरित करे। |
120. आर. बनामस्करविल्ले, (1916)2 के. बी. 658 | न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि यह आवश्यक नहीं है कि सहअपराधी संबंधित अपराध के हर विवरण स्वतंत्र संपुष्टि हो। - पर्याप्त है कि मामले की सारवान परिस्थितियों की संपुष्टि हो। |
121. सुखवंतसिंहबनामपंजाबराज्य, एआईआर1995 एससी1601 | न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि साक्षी को तब तक प्रति-परीक्षा नहीं जा सकती है, जब तक कि पहले उसकी मुख्य जांच जाए। जहां अभियोजन पक्ष ने अपने साक्षी की परीक्षा नहीं की और उसने प्रति-परीक्षा की, वहां यह अभिनिर्धारित किया गय अभियोजन ने स्वयं अपने साक्षी को छोड़ दिया। इस तरह का दृष्टिकोण अभियोजन पक्ष के मामले की विश्वसनीयता की ग को प्रभावित करता है। |
122. उत्तरप्रदेशराज्यबनामरमेशपाल, (1996) 10 एससीसी306 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि पक्षद्रोही साक्षी के साक्ष्य सूक्ष्म परीक्षण मांग की आवश्यकता होती है क्योंकि वह खुद का ही खंडन कर रहा है, और उसके कथन का वह हिस्सा, जो अभियोजन या बचाव पक्ष के अनुरूप है, उसको स्वीकृत किया जा सकता है। |
123. गणपतिबनामतमिलनाडूराज्य, (2018)5 एससीसी549 | किसी साक्षी को 'हितबद्ध साक्षी' तभी कहा जा सकता है, जब वह मुकदमे के परिणाम से कुछ लाभ प्राप्त करता है। इसलिए, 'संबंधित साक्षी' तथा 'हितबद्ध साक्षी' एक समान नहीं है। |
124. विद्याधरबनाममगिकराव, एआईआर1999 एससी1441 | जब वाद करने वाला पक्ष साक्ष्य नहीं देता है और स्वयं को परीक्षा के लिए प्रस्तुत नहीं करता है, तो यह उपधारित किया जाएगा कि उसके द्वारा स्थापित मामला सही नहीं है। |
125. चाकोबनामकेरलराज्य, (2004) 12 एससीसी269 | एक विश्वसनीय साक्षी बड़ी संख्या में महत्त्वहीन साक्षियों के गवाही की प्रासंगिकता को कम कर सकता है। |
126. जुवारसिंहबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर1981 एससी373 | यदि साक्षी का मौखिक साक्ष्य प्रथम दृष्टया अस्वीकार्य है, तो न्यायालय इसे केवल इसलिए स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि कोई प्रतिपरीक्षा नहीं हुई। |
127. गोपालसरवनबनामसत्यनारायण, एआईआर1989 एससी1141 | यदि साक्षी की मुख्य परीक्षा के बाद वह प्रति-परीक्षा के अधीन किए जाने के लिए उपस्थित नहीं होता, तो उसका साक्ष्य मूल्यविहीन हो जाता है। |
128. लीलाश्रीनिवासरावबनामआंध्रप्रदेशराज्य, एआईआर2004 एससी1720 | यह तथ्य कि कुछ साक्षियों को पक्षद्रोही घोषित किया गया है का परिणाम उनके साक्ष्य के स्वतः अस्वीकृति के रूप में नहीं होगा। पक्षद्रोही साक्षी के साक्ष्य भी अगर अन्य साक्ष्यों से समर्थन पाते हैं तो इस पर ध्यान दिया जा सकता है। |
129. रामचंदरबनामहरियाणाराज्य, एआईआर1981 एससी1036 | न्याय के प्रत्येक द्वार का पता लगाना पीठासीन न्यायाधीश का कर्तव्य है। उस उद्देश्य के लिए, उसे स्पष्ट रूप से धारा 165 के साथ साक्षियों से प्रश्न करने के अधिकार अभिव्यक्त रूप से निहित किया जाता है। यह अधिकार इतना व्यापक है कि वह किसी भी समय, किसी भी रूप में, किसी भी तथ्य जो चाहे सुसंगत हो अथवा असंगत, उसके बारे में प्रश्न पूछ सकता है। |
विविध (Misslenous) | |
130. राजाउर्फअय्यप्पनबनामतमिलनाडुराज्य, दाण्डिकअपीलसं. 1120 वर्ष2010, (1 अप्रैल, 2020 कोविनिश्चित) | यदि किसी कारण से संयुक्त विचारण नहीं किया जाता है, तो सहअभियुक्त की संस्वीकृति का किसी अन्य अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य में ग्राह्य होना नहीं माना जा सकता है, जो उसी वाद में समय के पश्चातवर्ती बिंदु पर विचारण का सामना करेगा। |
131. आर. जयपालबनामतमिलनाडुराज्य, (2019) 8 एस.सी.सी. 342 | यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह अनाज को फूस से अलग कर दे। जहां फूस को अनाज से अलग किया जा सकता है वहां अदालत के लिए खुला होगा कि वह अभियुक्त को दोषी ठहरा सकता है। हालांकि यदि अनाज और भूसे को अलग नहीं किया जा सकता है तो अभियोजन कथन को पूर्णतः खारिज कर दिया जाना चाहिए। |
132. रतनसिंहबनामनिर्मलगिल (सिविलअपीलसंख्या3681-3682 ऑफ2020) | उच्चतम न्यायालय ने दोहराया है कि यदि एक दस्तावेज पंजीकृत किया गया है तो एक दस्तावेज वास्तविक माना जाता है और अन्यथा साबित करने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर है जिसने कथित पंजीकृत दस्तावेज को चुनौती दी है। |
133. अर्जुनपंडितरावखोटकरबनामकैलाशकुशनरावगोरंतयालऔरअन्य, (सिविलअपीलसंख्या : 20825-20826 ऑफ2017) | उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि धारा 65 बी (4) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के माध्यम से साक्ष्य की पूर्ववर्ती ग्राह्यता के लिए एक शर्त है। जहाँ संबंधित व्यक्ति या प्राधिकारी से अपेक्षित प्रमाणपत्र आवेदन किया गया हो और व्यक्ति या प्राधिकरण या तो ऐसे प्रमाणपत्र देने से इंकार करता है या ऐसी मांग का उत्तर नहीं देता है, तो ऐसा प्रमाणपत्र मांगने वाला पक्ष साक्ष्य अधिनियम, सी पी सी या सी आर पी सी के प्रावधानों के तहत अपने उत्पादन के लिए न्यायालय को आवेदन कर सकता है। न्यायालय ने यह भी धारित किया कि यदि स्वयं मूल दस्तावेज प्रस्तुत किया जाता है तो धारा 65 बी (4) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र अनावश्यक है | उच्चतम न्यायालय की दो न्यायाधीश पीठ ने शाफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अनवर पी. वी. बनाम पी. के. बशीर के बीत मतभेद को ध्यान में रखते हुए प्रश्न का उल्लेख किया था। वह पक्ष जो डिवाइस के कब्जे में नहीं है, जिसमें से इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज का उत्पादन होता है, साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 बी (4) के तहत प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं हो सकती है। अनवर पी. वी. बनाम पी. के. बशीर में यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 65 बी के तहत आवश्यकताओं की पूर्ति न होने तक द्वितीयक साक्ष्य के रूप में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य में स्वीकार नहीं किया जाएगा। |
भारतीयसाक्ष्यअधिनियम (Indian Evidence Act) | |
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सामान्यसिद्धान्त | |
मामले | निर्णीततथ्य |
1. जोधनबनामम. प्र. राज्य, 2015 (3) सी.सी. एस.सी. 1217 (एस.सी.) | उपहत साक्षी के परिसाक्ष्य का अपना स्वयं का ही महत्त्व है और उस पर विश्वास व्यक्त किया जाना है, जब तक मुख्य परस्पर विरोध एवं असंगतियों के आधार पर उसके साक्ष्य को नामंजूर करने के ठोस आधार नहीं हैं उपहत साक्षी को विधितः विशेष प्रास्थिति प्रदान की गई है और उसको हुई उपहति घटना स्थल पर उसकी उपस्थिति की अंतर्निहित प्रत्याभूति होती है। |
2. खुर्शीदअहमदबनामजम्मूएवंकश्मीरराज्य, (2018) 7 एससीसी429 | पेश किये गए साक्ष्यों का विश्लेषण करते समय न्यायालय को एक अत्यंत तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। न्यायालय को मामूली विरोधाभासों पर साक्ष्यों को भी खारिज नहीं करना चाहिए। |
3. कामेश्वरसिंहबनामबिहारराज्य, (2018) 6 एससीसी433 | एक स्थिति में झूठा, सभी स्थितियों में झूठा (falsus in uno, falsus in omnibus)' सिद्धांत भारत में लागू नहीं होता है। यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह अनाज को भूसे के ढेर से अलग करे। सच्चाई का पता लगाना न्यायालय का कर्तव्य है। साक्षी की गवाही में सच्चाई होने पर साक्ष्यों में मामूली विरोधाभासों और चूक को नजरअंदाज किया जाना चाहिए। |
4. महेन्द्रनबनामतमिलनाडुराज्य, (2019) 5 एससीसी67 | सर्वोच्च न्यायालय ने अच्छी तरह से तय स्थिति को दोहराया कि 'एक स्थिति में झूठा, सभी स्थितियों में झूठा (falsus in uno, falsus in omnibus)' सिद्धांत भारत में लागू नहीं होता है। न्यायालय ने कहा कि अगर साक्षी की गवाही कथन के हिस्से के संबंध में अविश्वसनीय है, तो आरोपी को दोषी ठहराने के लिए कथन के दूसरे हिस्से को आधार नहीं बनाया जा सकता है। |
5. पुष्पादेवीएम. जाटियाबनामएम.एल. वधावन, एआईआर1987 एससी1748 | अवांछनीय साधनों के माध्यम से प्राप्त साक्ष्य को भी विचार में रखा जा सकता है बशर्ते कि वह सुसंगत हो। |
6. अब्दुलरज्जाकबनामस्टेट, (1969) 2 एससीसी234 | खोजी कुत्ते की मदद से तथ्यों की खोज वैज्ञानिक साक्ष्य है। |
7. कूनांबनामउड़ीसाराज्य, (2018) 1 एससीसी296 | अभिव्यक्ति 'साबित', 'नासाबित', 'साबित नहीं हुआ' साक्ष्य के मानक के दृष्टिकोण से, अर्थात् विवेकपूर्ण मनुष्य के दृष्टिकोण से परिस्थितियों के अस्तित्व या अंनस्तित्वा के बारे में मानक को निर्धारित करता है, इतना कि, विचार को अपनाते हुए 'सबूत' को मापने के लिए एक उपयुक्त ठोस मानक के रूप में आवश्यकता, पूर्ण प्रभाव की संभाव्यता या असंभाव्यता की परिस्थितियों को दिया जाना है। |
8. म्युनिसिपलकॉर्पोरेशनदिल्लीबनामजगननाथअशोककुमार, एआईआर1987 एससी2316 | मध्यस्थों को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए लेकिन वे साक्ष्यों की विधि से बाध्य नहीं होते हैं। |
9. गणेशके. गुलवेबनाममहाराष्ट्रराज्य, एआईआर2002 एससी3068 | यह जानने के लिए साक्ष्य की विवेचना की जानी चाहिए कि इसका कौन सा हिस्सा वस्तु की सही और सही स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। यह अनाज को भूसे के ढेर से अलग करने (Separating grain from the Chaff) जैसा कृत्य है। |
10. आशीषबाथमबनाममध्यप्रदेशराज्य, (2002) 7 एससीसी317 | सिविल मामलों में एक विषय (Matter) साबित होना तब कहां जाता है, जब संभाव्यता का संतुलन बनता है, लेकिन आपराधिक मामलों में न्यायालय को उचित संदेह से परे साक्ष्य की आवश्यकता होती है। |
11. रॉनीबनाममहाराष्ट्रराज्य, (1998) 3 एससीसी625 | अन्य अपराधों के अन्वेषण में प्राप्त साक्ष्य भी किसी दूसरे मामले में अच्छे साक्ष्य का निर्माण कर सकते हैं बशर्ते वह सुसंगत हो। |
12. बैनबनामव्हाइटरैवेनएंडफर्नेसजंक्शन, (1850) 3 एचएलसी1 | विधिक साक्ष्य विधि एक देशीय विधि (Lex Fori) है जो न्यायालयों को शासित करती है। |
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सुसंगततथ्य (Relevant Fact) | |
| 13. बसंतीबनामहिमाचलप्रदेशराज्य, (1987) 3 एससीसी227 | न्यायालय ने कहा कि जब हत्या के तुरंत बाद, हत्या के आरोपी व्यक्ति ने मृतक की अनुपस्थिति का वर्णन यह कह कर किया कि वह गांव छोड़ चुका था, तो न्यायालय ने उस कथन को एक ही संव्यवहार के भााग के रूप में माना और इस तरह वह सुसंगत है। |
| 14. आरबनामफोस्टर, (1834) 6 सीएंडपी35 | साक्षियों ने केवल तेज रफ्तार वाहन को देखा था न कि दुर्घटना को। घायल व्यक्ति ने दुर्घटना की प्रकृति बताई। उन्हें इस बात का साक्ष्य देने की अनुमति दी गई कि मृतक ने क्या कहा क्योंकि यह उसी संव्यवहार (res gestae) का भाग था। |
15. जी. विजयवर्धनरावबनामआंध्रप्रदेशराज्य, एआईआर1996 एससी2971 | एक ही संव्यवहार का एक भाग होने के लिए एक कथन को नैसर्गिक होना चाहिए और तथ्य के साथ समसामयिक होना चाहिए। यदि कृत्य समाप्त होने के बाद कथन कारित किया गया है और कथन देने वाले साक्षी के पास विचार या परावर्तन के लिए समय है तो यह प्रासंगिक नहीं है। |
16. गेनतेलारावबनामआंध्रप्रदेशराज्य, (1996) 6 एससीसी241 | तथ्य जो एक ही संव्यवहार के भाग हों (Doctrine of Res Gestae) का सिद्धांत सामान्य सिद्धांत का एक अपवाद है कि अनुश्रुत साक्ष्य (Hearsay Evidence) को सबूत के रूप में स्वीकार नहीं करता हैं। धारा 6 के तहत ग्राह्य कुछ तथ्यों को स्वीकार करने का औचित्य या तथ्यों की ग्राह्यता विवाद्यक तथ्यों के संबंध में इस तरह के कथनों या तथ्यों की सहजता और स्पष्टता के कारण है। |
17. सुखरबनामउत्तरप्रदेशराज्य, (1999) 9 एससीसी507 | धारा 6 सामान्य सिद्धान्त का एक अपवाद है कि अनुश्रुत साक्ष्य ग्राह्य नहीं है। धारा 6 के प्रावधान के भीतर अनुश्रुत साक्ष्य के प्रयोग के लिए यह स्थापित किया जाना चाहिए कि अधिनियम विवाद्यक तथ्य के साथ समसामयिक था और दोनों के मध्य कोई अंतराल नहीं होना चाहिए जो छल प्रवंचना का अवसर दे सके। |
18. रामलोचनबनामपश्चिमबंगालराज्य, एआईआर1963 एससी1074 | मानव शरीर के कंकाल के ऊपर मिलान के लिए रखी गयी मृतक की तस्वीर यह साबित करने के लिए ग्राह्य थी कि कंकाल मृतक का था। |
19. पम्मीबनाममध्यप्रदेशसरकार, (1998) 6 एससीसी609;
जदुनाथसिंहबनामउत्तरप्रदेशराज्य, एआईआर1971 एससी363 | परीक्षण पहचान परेड (Holding Test Identification) आयोजित करना अनिवार्य नहीं है। इसके आयोजन में विफलता अभियोजन पक्ष के लिए घातक नहीं है, जहां गवाह पहले से आरोपी व्यक्तियों को जान रहे थे |
20. अब्दुलवहीदखानबनामआंध्रप्रदेश, (2002) 7 एससीसी175 | यह वांछनीय है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के तुरंत बाद पहचान परेड आयोजित की जाए। |
21. हरनाथसिंहबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर1970 एससीसी1619 | पुलिस साक्षियों को सक्षम करने के उद्देश्य से पहचान परेड आयोजित करनी होती है, जो उन संपत्तियों की पहचान करने के लिए है जो अपराध के विषय हैं या उन व्यक्तियों की पहचान करना जो इसके साथ संबंध रखते हैं। पहचान परेड के निम्नलिखित दो उद्देश्य हैं:- 1. अन्वेषण अधिकारियों को संतुष्ट करने के लिए कि साक्षियों से पहले से अज्ञात कुछ व्यक्ति अपराध में शामिल थे। 2. न्यायालय के समक्ष साक्षी की गवाही को पुष्ट करने के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करना। |
22. सुरेंद्रनारायणबनामउत्तरप्रदेशराज्य, एआईआर1998 एससी3031 | शिनाख्त की परेड का आयोजन तब भी अनिवार्य नहीं है, जब इसकी मांग अभियुक्त द्वारा की जाए। अभियोजन ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं है। |
23. मलखानसिंहबनाममध्यप्रदेशराज्य, (2003) 5 एससीसी746 | शिनाख्त परेड एक कमजोर प्रकार का है। यह एक मौलिक साक्ष्य नहीं है। शिनाख्त परेड आयोजित करने में विफलता न्यायालय में शिनाख्त के साक्ष्यों को अग्राह्य नहीं करेगी। |
24. अमरनाथझाबनामनंदकिशोरसिंह, (2018) 9 एससीसी137 | शिनाख्त परेड का आयोजन (TIP) न करना अभियोजन के मामले के लिए स्वयं में घातक नहीं है, लेकिन यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालयों द्वारा विचारणीय होगा। |
25. सुखपालसिंहबनामपंजाबराज्य, (2019) 15 एससीसी622 | परिस्थितिजन्य साक्ष्य के एक मामले में हेतुक स्थापित करने के लिए अभियोजन पक्ष की अक्षमता हमेशा अभियोजन के मामले के लिए संघातिक नहीं होती है, यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया था। |
26. जयंतीभाईभेंकरभाईबनामगुजरातराज्य, (2002) 8 एससीसी165 | अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक (Plea of alibi) धारा 11 के अंतर्गत साक्ष्य का एक नियम है। अपराध साबित करने का भार अभियोजन पक्ष पर है और यह केवल इस तथ्य से कम नहीं किया जाएगा कि अभियुक्त ने अन्यत्र उपस्थिति के अभिवाक् लिया था। अभियुक्त द्वारा लिया गया अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् पर केवल तभी विचार करने की आवश्यकता है जब अभियोजन के भार को संतोषजनक ढंग से उन्मुक्ति दे दी गई हो। |
27. दूधनाथपांडेयबनामउत्तरप्रदेशराज्य, (1981) 2 एससीसी166 | अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् (plea of alibi) यह दर्शाता है कि आरोपी व्यक्ति घटना स्थल के बजाय किसी अन्य स्थान पर मौजूद था जिसका साक्ष्य उसके पास मौजूद है। |
28. दसारीसिवाप्रसादरेड्डीबनामपब्लिकप्रॉसिक्यूटर, उच्चन्यायालयआन्ध्रप्रदेश, एआईआर2004 एससी4383 | अभियुक्तों की ओर से अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् स्थापित करने में विफलता अभियोजन की सहायता नहीं करता है। इस प्रकार, अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् स्थापित करने के लिए अभियुक्त की ओर से विफलता इस निष्कर्ष को जन्म नहीं देगी कि अभियुक्त अपराध के स्थान पर मौजूद था। |
29. केहरसिंहबनामदिल्लीप्रशासन, एआईआर1980 एससी1883 | धारा 10 को प्रवर्तन में लाने के लिए षडयंत्र का केवल प्रथम दृष्टया मामला स्थापित किया जाना जरूरी होता है। |
30. बद्रीरायबनामबिहारराज्य, एआईआर1958 एससी953 | धारा 10 को अपराध की प्रकृति के कारण, षड्यंत्रकारियों के पूरे समूह के विरुद्ध सह षड्यंत्रकारियों के कृत्यों / कथनों पर लागू करने के लिए अधिनियमित किया गया है। |
31. सार्दुलसिंहबनामबॉम्बेराज्य, एआईआर1957 एससी747 | धारा 10 में निहत सिद्धांत 'अभिकरण का सिद्धांत (Principle of Agency) पर आधारित है। यह आपराधिक मामलों में अभिकरण के सिद्धांत को उस अवधि के भीतर षड्यंत्रकारियों के कृत्यों के लिए निर्धारित करता है, जिसके दौरान यह कहा जा सकता है कि कृत्य उनके सामान्य आशय के संदर्भ में थे। |
32. मिर्ज़ाअकबरबनामबादशाह (King Emperor), एआईआर1940 पीसी176 | धारा 10 के तहत 'सामान्य आशय' शब्द उस समय मौजूद सामान्य आशय को दर्शाता है जब कोई भी कार्य अथवा कथन उनमे से किसी एक द्वारा किया गया, किया गया या लिखा गया हो, जबकि षडयंत्र वहां सामान्य आशय की उपस्थिति में साक्ष्य के रूप में सुसंगत थी। सामान्य आशय या षडयंत्र के समाप्ति के बाद कोई कथन, वृत्तांत या संस्वीकृति, धारा 10 के तहत ग्राह्य नहीं है। |
33. सीबीआईबनामवी.सी. शुक्ला, एआईआर1998 एससी1406 | सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति को दूसरों के कृत्यों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है, जब तक कि उन्हें उसके द्वारा उकसाया या उसके ज्ञान या सहमति से नहीं किया जाता है। धारा 10 इस नियम का अपवाद प्रस्तुत करता है कि एक मूलतः प्रकट कृत्य, जो किन्हीं षड्यंत्रकारियों में से एक द्वारा किया गया हो, अभिकरण के सिद्धांतों को लागू करने के लिए पर्याप्त है |
34. साईलसिंहबनामबॉम्बेराज्य, एआईआर1957 एसी747 | धारा 10 के तहत अंतर्निहित साक्ष्य 'अभिकरण का सिद्धांत' (theory of agency) है। |
35. आर.एम. मलकानीबनाममहाराष्ट्रराज्यएआईआर1973 एससी 157 | टेप रिकॉर्डेड वार्तालाप ग्राह्य है बशर्ते कि वह विवाद्यक मामले से सुसंगत हो, उससे आवाज की पहचान हो एवं टेप रिकॉर्ड को मिटाने की संभावना को खत्म करके वार्तालाप की सटीकता सिद्ध की गई हो। |
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सुसंगतता/ग्राह्यता (Relevancy & Admissibility) | |
36. रामबिहारीयादवबनामबिहारराज्य, (1994) 4 एससीसी517 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि 'सुसंगतता' और 'ग्राह्यता' शब्द समव्यापी या परस्पर विनिमय करने योग्य नहीं हैं। उनका विधिक प्रसंग अलग हैं। सभी ग्राह्य साक्ष्य आमतौर पर सुसंगत होते हैं, लेकिन सभी सुसंगत साक्ष्य ग्राह्य नहीं होते हैं |
37. गोरखपुरकलेक्टरबनामपलकधारीसिंह (1890) आईएलआर12 ऑल1 | जहां एक न्यायाधीश किसी विशेष साक्ष्य की ग्राह्यता के बारे में संदेह में है, उसे अग्राह्यता के बजाय ग्राह्यता के पक्ष में निर्णय करना चाहिए। |
38. साहूबनामउत्तरप्रदेशराज्य, एआईआर1966 एससी40 | साक्ष्य की ग्राह्यता और उसके पुख्ता/मुख्य होने के बीच एक अंतर है। न्यायालय को दोहरे परीक्षण को लागू करना चाहिए- पहला, क्या संस्वीकृति पूरी तरह से स्वैच्छिक थी और दूसरा, यदि ऐसा है तो क्या वाह सत्य और विश्वसनीय है। |
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प्रत्यक्षएवंपरिस्थितिजन्यसाक्ष्य | |
39. ऋषिपालबनामउत्तराखंडराज्य, एआईआर2013 एससी3641;
कूनाबनामओडिशाराज्य, (2018) 1 एससीसी296 | परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामले में हेतु महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। |
40. उत्तरप्रदेशराज्यबनामरवीन्द्रप्रकाशमित्तल, एआईआर1992 एससी2045;
गणपतसिंहबनाममध्यप्रदेशराज्य, (2017) 16 एससीसी353 | कभी-कभी प्रत्यक्ष साक्ष्य प्राप्त करना बहुत कठिन होता है। ऐसे मामलों में न्यायालय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर भरोसा करते हैं। वे मामले से संबंधित परिस्थितियों से साक्ष्य प्राप्त करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखते हुए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की विवेचना करनी चाहिए- 1. जिन परिस्थितियों से निष्कर्ष निकाला गया है, उन्हें पूरी तरह से स्थापित किया जाना चाहिए। 2. परिस्थितियाँ निश्चायक प्रकृति की होनी चाहिए। 3. स्थापित किए गए सभी तथ्य केवल अपराध की परिकल्पना और निर्दोषिता के साथ सुसंगत होने के अनुरूप होना चाहिए। 4. परिस्थितियों को एक नैतिक निश्चितता के लिए, अभियुक्त के सिवाय किसी भी व्यक्ति की संभावना को बहिष्करण करना चाहिए। |
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स्वीकृतिएवंसंस्वीकृति | |
41. कौशलटोप्पाबनामझारखंडराज्य, (2019) 13 एस.सी.सी. 676 | एक न्यायिकेतर संस्वीकृति एक कमजोर साक्ष्य है। संपोषक साक्ष्य के अभाव में उस पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। एक न्यायिकेत्तर संस्वीकृति को सह-अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य का मूल हिस्सा नहीं माना जा सकता है। |
42. दिगंबरवैष्णवबनामछत्तीसगढ़राज्य, (2019) 4 एस.सी.सी. 522 | धारा 27 के तहत प्रत्येक तथ्य की खोज ग्राह्य नहीं है केवल प्रासंगिक तथ्य की खोज ग्राह्य है। |
43. दीपकभाईजगदीशचंद्रपटेलबनामगुजरातराज्य, (2019) 16 एस.सी.सी. 547 | धारा 25 घोषणा करती है कि पुलिस कार्यालय में किए गए किसी भी संस्वीकृति को किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ साबित नहीं किया जाएगा। इस तरह की संस्वीकृति अभी भी अधिनियम की धारा 21 के तहत स्वीकृति के रूप में ग्राह्य की जा सकती है, लेकिन सी आर पी सी की धारा 162 के तहत स्वीकार्यता के वर्जन के अधीन है। |
44. भारतसिंहबनामभागीरथी, एआईआर1966 एससी405 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि स्वीकृति, ग्राह्य किये गए तथ्य के मौलिक साक्ष्य हैं और स्वीकृति जो विधिवत प्रमाणित हैं वह भी ग्राह्य है, चाहे उसे प्रस्तुत करने वाला पक्ष साक्षी के रूप में उपस्थित हों या न हो। |
45. हनुमंतनारायणबनाममध्यप्रदेशराज्य, 1975 एआईआर1083 एस.सी. | स्वीकृति का उपयोग खण्डों में नहीं किया जा सकता है। यह या तो पूर्ण रूप से स्वीकार या पूर्ण रूप से अस्वीकार किया जा सकती |
46. पकलानारायणस्वामीबनामबादशाह (Emperor), एआईआर1939 पीसी47;
पलविंदरकौरबनामपंजाबराज्य, एआईआर1952 एससी354 | 'संस्वीकृति' (confession) शब्द लॉर्ड एटकिन द्वारा परिभाषित किया गया था। पलविंदर कौर के मामले में प्रिवी काउंसिल द्वारा दी गई परिभाषा को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित किया गया था। न्यायालय ने कहा कि एक संस्वीकृति को या तो अपराध के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए या फिर किसी भी दशा में उन सभी तथ्यों को जो अपराध को गठित करते हैं।' (The court held that 'a confession must either admit in terms the offience, or at any rate substantialy all the fals which constitute the offence')। |
47. अब्दुलराशिदबनामबिहारराज्य, एआईआर2001 एससी2422 | न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि बिहार और उड़ीसा आबकारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत अभियुक्त द्वारा अधीक्षक को दी गयी संस्वीकृति को अनुचित एवं अग्राह्य माना गया क्योंकि आबकारी अधिकारी को धारा 25 के अर्थ के तहत पुलिस अधिकारी के रूप में माना गया था। |
48. अघ्नूनागेसियाबनामबिहारराज्य, एआईआर1966 एससी119 | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया कि कथन, अभियुक्त ने अपराध किया या फिर उसने कुछ जगहों पर प्रयोजन छिपाया, ग्राह्य नहीं है। केवल कथन का वही भाग ग्राह्य है जो छिपाए गए प्रयोजन के स्थान के बारे में सूचना उद्घाटित करता है। |
49. मो. इनायतुल्लाहबनाममहाराष्ट्रराज्य, एआईआर1976 एससी483 | सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देशित किया कि यह साबित करना आवश्यक है कि वस्तु को छिपाने के स्थान से खोजा गया था। यदि वस्तु एक खुली जगह पर पड़ी है, तो संभावना है कि दूसरों को इसके बारे में पता चल सकता है और यह साबित करना कठिन होगा कि अभियुक्त द्वारा प्रदान की गई जानकारी के आधार पर वस्तु की खोज की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 27 धारा 24 से 26 की अपवाद है। |
50. पांडुरंगाकल्लूपाटिलबनाममहाराष्ट्रराज्य, (2002) 2 एससीसी490 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 27, धारा 25 और 26 की अपवाद है। |
51. उत्तरप्रदेशराज्यबनामदेवमणउपाध्याय, एआईआर1960 एससी1125 | धारा 27 की संवैधानिक वैधता को धारित किया गया। |
52. निशिकांतझाबनामबिहारराज्य, एआईआर1952 एससी1033 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संस्वीकृतकारी कथन के एक भाग पर भरोसा करने और बाकी को खारिज करने में कुछ भी गलत नहीं है। जब निर्दोषकारी भाग को अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं, तो न्यायालय सदोषकारी भाग पर विश्वास कर सकता है। |
53. प्यारेलालबनामराजस्थानराज्य, एआईआर1963 एससी1094 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यदि न्यायालय संतुष्ट है कि संस्वीकृति सत्य और स्वैच्छिक रूप से की गई है तो एक प्रत्याहारी संस्वीकृति (Retracted Confession) दोषसिद्धि का आधार बन सकती है। विधि के मामले के रूप में, अगर न्यायालय संस्वीकृति की सत्यता और स्वैच्छिक प्रकृति के बारे में आश्वस्त हो तो सम्पुष्टि आवश्यक नहीं है; हालांकि प्रज्ञा (Prudence) की आवश्यकता होती है कि बिना पुष्टि के प्रत्याहारी संस्वीकृति के आधार पर कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। |
54. पंजाबराज्यबनामगुरदीपसिंह, (1999) 7 एससीसी714 | न्यायिकेत्तर संस्वीकृति साक्ष्य में ग्राह्य है और उचित मामलों में न्यायालय, इस पर भरोसा कर सकता है और अभियुक्त को दोषसिद्ध कर सकता है। |
55. कर्नाटकराज्यबनामपी. रविकुमार, (2018) 9 एससीसी614 | न्यायिकेत्तर संस्वीकृति एक कमजोर साक्ष्य है और यह अभियुक्त को दोषसिद्ध ठहराने का का आधार नहीं बन सकता है, जब तक कि अन्य मौलिक साक्ष्यों से समर्थन नहीं हो जाता है। |
56. आशीषजैनबनाममकरंदसिंह, (2019) 3 एससीसी770 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अन्वेषण अधिकारी के अनुचित दबाव और बाध्यता के तहत किए गए अनैच्छिक संस्वीकृति का कोई साक्ष्यिक मूल्य नहीं है, भले ही वह अपराध से संबंधित भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति का कारण बने। |
57. रामभरोसेशर्माबनाममहंतरामस्वरूप, (2001) 9 एससीसी471 | एक कथन जो तथ्य और विधि के मिश्रित प्रश्न पर एक स्वीकृति की प्रकृति का है, धारा 17 के तहत एक स्वीकृति के रूप में नहीं माना जा सकता है, क्योंकि केवल तथ्यों की एक स्वीकृति स्वीकृतिकर्ता को बाध्य करती है विधि के प्रश्न के लिए की गयी स्वीकृति। |
58. सत्रुचारलाविजयारामराजूबनामनिम्मकाजयाराजू, (2006) 1 एससीसी212 | जहाँ एक व्यक्ति स्वयं के पक्ष में कोई कथन करता है, बाद में वह उसके हितों के प्रतिकूल हो जाता है, तो यह एक स्वीकृति के रूप में उसके विरुद्ध साबित की जा सकती है। |
59. भारतसिंहबनामभगीरथ, एआईआर1966 एससी405 | एक स्वीकृति, स्वीकार किये गए तथ्य का एक मौलिक साक्ष्य है और विधिवत प्रमाणित एक ग्राह्य साक्ष्य है। |
60. स्टेट (राष्ट्रीयराजधानीक्षेत्र, दिल्ली) बनामनवजोतसिंधु, (2005) 11 एससीसी600 | संस्वीकृति को अत्यधिक विश्वसनीय माना जाता है क्योंकि कोई भी तर्कसंगत व्यक्ति खुद के विरुद्ध स्वीकृति नहीं करेगा जब तक कि वह स्वयं की अंतरात्मा द्वारा सत्य बताने के लिए प्रेरित न हो। |
61. पलविंदरकौरबनामपंजाबराज्य, एआईआर1952 एससी354 | संस्वीकृति या तो पूर्ण रूप से स्वीकार की जानी चाहिए या पूर्ण रूप से अस्वीकार कर दी जानी चाहिए। |
62. मोहम्मदइनायतुल्लाहबनाममहाराष्ट्रराज्य, एआईआर1976 एससी483 | सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 27 के संबंध में निम्नलिखित मत रखे – 1. अभियुक्त से प्राप्त जानकारी के परिणाम में तथ्य की प्राप्ति होनी चाहिए। 2. तथ्य की प्राप्ति को अवधारित किया जाना चाहिए 3. सूचना प्राप्त होने के समय अभियुक्त को पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिए। 4. वह जानकारी जो कि तथ्य की प्राप्ति से संबंधित है केवल वही ग्राह्य है। |
63. सीबीआईबनामवी. सी. शुक्ला, (1998) 3 एससीसी410 | स्वीकृति दूसरों के विरुद्ध एक साक्ष्य नहीं है। एक स्वीकृति दूसरों के विरुद्ध साक्ष्य तभी बन सकती है यदि वह एक संस्वीकृति के रूप हो। तब इसका उपयोग सह-अभियुक्त के संस्वीकृति के रूप में धारा 10 के तहत या धारा 30 के तहत किया जा सकता है। |
64. विश्वनाथप्रसादबनामद्वारकाप्रसाद, एआईआर1974 एससी117 | प्रथम कथन देने वाला पक्ष तथा वह साक्षी जिसकी परीक्षा होती है और कथन को उसके विरुद्ध प्रयोग किया जाता है, इन दोनों में अंतर है। पहले मामले में एक पक्ष द्वारा दी गई स्वीकृति अगर धारा 21 में प्रदत्त आवश्यकताओं को पूरा करती है तो वह एक मौलिक साक्ष्य के रूप में मानी जाएगी। दूसरे मामले में प्रथम कथन, साक्षी की विश्वसनीयता को खंडित करने के लिए प्रयोग किया जाता है और मौलिक साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं होगी। |
65. जयसलीनबनामतमिलनाडुराज्य, एआईआर2009 एससी1901 | संस्वीकृति को पूर्ण रूप से स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जाना चाहिए तथा न्यायालय सदोषकारी भाग को स्वीकार करने तथा निर्दोषकारी भाग को अस्वीकार करने के लिए सक्षम नहीं है। परंतु उन स्थितियों में जहां निर्दोषकारी भाग न केवल स्वाभाविक रूप से अनुचित है, बल्कि यह अन्य साक्ष्यों द्वारा विरोधाभासी है। न्यायालय सदोषकारी भाग को स्वीकार कर सकता है। |
66. बालकिशनबनाममहाराष्ट्रराज्य, एआईआर1981 एससी379 | एक अधिकारी पुलिस अधिकारी है या नहीं यह निर्धारित करने के लिए प्राथमिक परीक्षण यह है कि क्या संबंधित अधिकारी (विशेष अधिनियम के तहत) को अन्वेषण के लिए सभी शक्तियां प्रदान की गई हैं या नहीं, जिसमें चार्जशीट प्रस्तुत करके अभियोजन शुरू करने की शक्ति भी शामिल है। |
67. राजकुमारकरवालबनामभारतसंघ, एआईआर1991 एससी45 | पुलिस अधिकारी की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसके पास न केवल अन्वेषण की शक्ति होनी चाहिए, बल्कि आरोपी के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज करने की शक्ति होनी चाहिए। जब तक उसके पास आरोप का अन्वेषण करने और उसे आरोप-पत्र दाखिल करने की शक्ति नहीं है, तब तक उसे धारा 25 के अर्थों में उसे एक पुलिस अधिकारी नहीं कहा जा सकता है |
68. मोहम्मददस्तागीरीबनामराज्य, एआईआर1960 एससी756 | धारा 27 के तहत यह आवश्यक नहीं है कि जब कथन कारित किया गया था तब वह अभियुक्त था, उसे अभियुक्त बनाने के लिए यह पर्याप्त है कि इस तरह के कथन को न्यायालय में साबित किया जाए। |
69. हिमाचलप्रदेशराज्यबनामजीतसिंह, एआईआर1999 एससी1293 | धारा 27 के तहत कथन केवल इसलिए अग्राह्य नहीं बन जाते हैं क्योंकि उनकी प्राप्ति किसी ऐसी जगह से की गई है जो दूसरों के लिए खुली या सुलभ है। वस्तु को उन स्थानों पर भी छुपाया जा सकता है जो दूसरों के लिए खुले और सुलभ हैं। महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या वस्तु दूसरों को सामान्य रूप से दिखाई दे रही थी, यदि नहीं तो यह महत्त्वहीन (Immaterial) है कि वह स्थान दूसरों के लिए सुलभ था या नहीं। |
70. पुलुकुरीकोट्टायाबनामएंपरर, एआईआर1947 पीसी67 | 'तथ्य की खोज' का अर्थ है वह स्थान जहाँ से वस्तु को प्राप्त किया गया तथा अभियुक्त का इस विषय में ज्ञान था। इस जानकारी का साक्ष्य में ग्राह्य होना अनुमन्य है। यह उस जानकारी के केवल उस हिस्से तक सीमित है, जो 'तथ्य की खोज' से संबंधित है। |
71. केहरसिंहबनामराज्य, एआईआर1988 एससी1883 | मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज की गई संस्वीकृति साक्ष्य में ग्राह्य होगी। यदि यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के प्रावधानों के अनुपालन में दर्ज की गई है। यदि संस्वीकृति दर्ज करने में कोई अनियमितता है, तो यह तभी ग्राह्य होगी, जब अनियमितताएं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 463 के तहत सुधार करने योग्य हों। |
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मृत्युकालिककथन (Dying Declaration) | |
72. उकारामबनामराजस्थानराज्य, एआईआर2001 एससी1814 | कोई भी व्यक्ति अपनी जिह्वा पर झूठ रखकर नहीं मरेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि आसन्न मरण की भावना मनुष्य के मन में वैसी बी भावना पैदा करती है जैसी शपथ से बाध्य एक पुण्य व्यक्ति के मन में होती है और उस व्यक्ति के झूठ बोलने की संभावना पूरी तरह से नहीं होती है। |
73. पाकलानारायणस्वामीबनामएंपरर, एआईआर1939 पीसी47 | न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मृतक ने अपनी पत्नी से जो कथन किया था कि वह अभियुक्त के पास उससे पैसे लेने के लिए जा रहा था, धारा 32 (1) के तहत ग्राह्य है। |
74. कौशलरावबनामबॉम्बेराज्य, (1958) एससीआर552 | यह न तो विधि का शासन होगा और न ही प्रज्ञा का, जब यह कहा जाए कि मृत्युकालिक कथन दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बन संकता जब तक कि इसकी स्वतंत्र साक्ष्य द्वारा संपुष्टि न की जाए। एक सत्य और स्वैच्छिक कथन के लिए किसी संपुष्टि की आवश्यकता नहीं है। |
75. संपतबब्सोकालेबनाममहाराष्ट्रराज्य, (2019)4 एससीसी739 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि हालांकि दोषसिद्धि पूरी तरह से मृत्युकालिक कथन पर आधारित हो सकती है, लेकिन उस स्थिति में जब यह संदेह हो कि पीड़ित अच्छी मनोस्थिति में था या नहीं, पुष्टिकारक साक्ष्य की आवश्यकता हो सकती है। |
76. क्वीनएंप्रेसबनामअब्दुल्लाह, (1885) 7 11 385 एफबी | यह अभिनिर्धारित किया गया कि संकेतों और सर हिला के दिया गया मृत्युकालिक कथन भी सुसंगत है। |
77. सुरेशचन्द्रजेनाबनामपश्चिमबंगालराज्य, (2017)16 एससीसी466 | ऐसा कोई पूर्ण नियम नहीं है कि मृत्युकालिक कथन दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बन सकता है जब तक कि पुष्टि की आवश्यकता बताने वाला नियम केवल विवेक संगत (Prudance) नियम है। |
78. भद्रगिरिवेंकटरविबनामपब्लिकप्रॉसिक्यूटर, 2013 | यदि मृत्युकालिक कथन स्वैच्छिक, विश्वसनीय और अच्छी मानसिक स्थिति में किया जाया है, तो इस पर बिना किस किया जा सकता है। किसी भी विसंगति की स्थिति में, इस पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं होगा। |
79. संजयबनाममहाराष्ट्रराज्य, (2007)9 एससीसी148 | यदि दो मृत्युकालिक कथनों में स्पष्ट विसंगतियां हैं, तो अभियुक्त को दोषी ठहराना असुरक्षित होगा। |
80. के. रामचंदरेड्डीबनामपब्लिकप्रॉसिक्यूटर, (1976)3 एससीसी104 | जब घायल व्यक्ति पहले प्राथमिकी दर्ज कराता है उसके बाद उसकी मृत्यु हो जाती है तो प्राथमिकी को मृत्युकालिक सुसंगत माना जाएगा। |
81. कौशलरावबनामबॉम्बेराज्य, एआईआर1958 एससी22 | विधि का यह कोई पूर्ण नियम नहीं है कि मृत्युकालिक कथन दोषसिद्धि (conviction) साक्षी का एकमात्र आधार है जब तक कि उसकी संपुष्टि न कर ली जाए। यह किसी भी अन्य साक्ष्य की तुलना में एक कमजोर प्रकार का साथ किसी भी अन्य साक्ष्य के रूप में उसी पायदान पर खड़ा है जिसपर अन्य साक्ष्य हैं। |
82. कुसाबनामओडिशाराज्य, एआईआर1980 एससी559 | जब एक मृत्युकालिक कथन को सत्य तथा संगत माना जाता है तब दोषसिद्धि करने के लिए इस पर भरोसा किया जा ही इसकी कोई संपुष्टि न हो। |
83. लक्ष्मणबनाममहाराष्ट्रराज्य, (2019)11 एससीसी512 | मृत्युकालिक कथन मौखिक या लिखित और संचार के किसी भी पर्याप्त तरीके से हो सकता है, यह शब्दों द्वारा या अन्य से पर्याप्त होगा, बशर्ते कि संकेत निश्चित और सकारात्मक हों। |
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विशेषज्ञसाक्ष्य (Expert Evidence) | |
84. बालकृष्णदासअग्रवालबनामराधादेवीएवंअन्य, एआईआर1989 एएलएल133 | एक विशेषज्ञ ऐसा व्यक्ति है जिसने अपने प्रशिक्षण और अनुभव से राय व्यक्त करने की ऐसी क्षमता हासिल कर ली है जो साक्षी के पास नहीं है। किसी विशेषज्ञ के साक्ष्य ऐसे साक्ष्य होते हैं जो विशेषज्ञता और अनुभव पर आधारित होते हैं। |
85. अब्दुलरहमानबनाममैसूरराज्य, (1972) जीएलजे407 | सोने की शुद्धता के प्रश्न में एक पेशेवर सुनार की राय को एक विशेषज्ञ की राय के रूप में प्रासंगिक माना गया, हाट पास कोई औपचारिक योग्यता नहीं थी। उसकी एकमात्र योग्यता अनुभव था। |
86. एस. गोपालारेड्डीबनामआंध्रप्रदेशराज्य, एआईआर1996 एससी2184 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक विशेषज्ञ का साक्ष्य कमजोर प्रकार का साक्ष्य है। न्यायालय इसे निश्चायक हैं और इसलिए, स्वतंत्र और विश्वसनीय संपुष्टि के बिना इस पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है। |
87. दर्शनसिंहबनामहरियाणाराज्य, एआईआर1997 एससी364 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जहां चश्मदीद गवाह (प्रत्यक्ष साक्षी) एवं चोट कैसे लगी के बीच असंगतता है, तब चिकित्सक के साक्ष्य प्रत्यक्ष साक्षी साक्ष्य को निःसंदेह अधिभावी (override) नहीं कर सकता है। |
88. फखरुद्दीनबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर1967 एससी1326 | यह अभिनिर्धारित किया गया कि हस्तलेख ऐसे साक्षी के साक्ष्य से साबित हो सकती है जिसकी उपस्थिति में लेखन किया गया था और यह प्रत्यक्ष साक्ष्य होगा और यदि यह उपलब्ध है तो किसी अन्य प्रकार के साक्ष्य को अनावश्यक माना जाएगा। |
89. लतेशबनाममहाराष्ट्रराज्य, (2018)3 एससीसी66 | मौखिक साक्ष्य चिकित्सकीय साक्ष्य पर प्रधानता (Precedence) रखते हैं. जब तक कि चिकित्सकीय साक्ष्य ऐसी घटना की किसी भी संभावना का पूरी तरह से खंडन नहीं करता। |
90. आशीषजैनबनाममकरंदसिंह, (2019)3 एससीसी770 | सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि केवल एक मैजिस्ट्रेट के आदेश की अनुपस्थित होने के कारण जो कि पुलिस को अभियुक्त की अंगुलिचिह्न प्राप्त करने के लिए अधिकृत करे, यह नहीं माना जा सकता कि अंगुलिचिह्न साक्ष्य अवैध रूप से प्राप्त किया गया था। |
91. हिमाचलप्रदेशराज्यबनामजयलालएवंअन्य, (1999)7 एससीसी280 | एक साक्षी के साक्ष्य को एक विशेषज्ञ के रूप में लाने के लिए यह दिखाना होगा कि उसने विषय का एक विशेष अध्ययन किया है या एक विशेष अनुभव प्राप्त किया है या दूसरे शब्दों में, वह कुशल है और उसे विषय का पर्याप्त ज्ञान है। |
92. मुरारीलालबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर1980 एससी531 | विधि या प्रज्ञा (Prudence) का कोई ऐसा नियम नहीं है जो कहता है कि विशेषज्ञ की राय पर तंब तक कभी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए जब तक कि उसकी संपुष्टि न हो। उपयुक्त मामलों में संपुष्टि की मांग की जानी चाहिए। |
93. विलायतखानबनामराज्य, एआईआर1962 एससी122 | विशेषज्ञ की राय पर तब विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, जब वह प्रत्यक्ष साक्ष्य के विरोधाभास में हो। |
94. मुशीरखानबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर2010 एससी762 | अंगुलिचिह्न विशेषज्ञ का साक्ष्य कोई मौलिक साक्ष्य नहीं हैं। इसका उपयोग केवल अभिलिखत मौलिक साक्ष्यों की कुछ वस्तुओं की संपुष्टि करने के गए किया जा सकता है। |
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दस्तावेजीएवंमौखिकसाक्ष्य | |
95. पीगोपालकृष्णनउर्फदिलीपबनामकेरलराज्यएवंअन्य, 2019 सर्वोच्चन्यायालय (एससी) 1306 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक अपराध के संबंध में एक मेमोरीकार्ड की सामग्री एक 'दस्तावेज' है न कि कोई 'भौतिक वस्तु'। |
96. महाराष्ट्रराज्यबनामप्रफुल्लबी. देसाई, (2003)4 एससीसी601 | साक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है। इसमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग शामिल होगी। |
97. रूपकुमारबनाममोहनथडानी, (2003)6 एससीसी595 | धारा 91 और 92 लिखित अभिलेखों के मामले में एकीकरण के न्यायिक कार्य की मान्यता पर आधारित (Section 91 and 92 are based on recognibion of the jural act of integration in case of written in struments) हैं और एक संविदा स्थापित करने की मांग करने वाले तीसरे पक्ष पर भी लागू होते हैं। नोट : साक्ष्य अधिनियम की धारा 91 एवं 92 "लिखत को लिखत के द्वारा ही साबित किया जा सकता है" की अवधारणा पर आधारित है। |
98. आर. जानकीरमनबनामराज्य, (2006)1 एससीसी697 | धारा 92 तब लागू होती है जब किसी मामले में लिखत के पक्षकार अपनी शर्तों का नासाबित करना चाहता है। यह तब लागू नहीं होता है जब कोई व्यक्ति, जिसमें लिखत मामले के पक्षकार सम्मिलित हैं, यह स्थापित करना चाहता है कि मामला स्वयं दिखावटी एवं काल्पनिक है। |
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उपधारणाएवंसाक्ष्यकाभार | |
99. आंध्रप्रदेशराज्यबनामवासुदेवराव, (2004)9 एससीसी319 | उपधारणा दूसरे ज्ञात या साबित तथ्यों से निगमित तथ्यों का अनुमान हो (A presumption is an inference of fact drawn from other known or roved facts)। इसका तात्पर्य यह है, कि यह एक विधि का नियम है कि न्यायालय और न्यायाधीश एक विशेष तथ्य से एक विशेष निष्कर्ष निकालेंगे। |
100. सेठूबनामपलानी, (1926)50 एमएलजे453 | धारा 112 के तहत उपधारणा समान बल के साथ लागू होती है, यहां तक कि उन मामलों में भी जहां बच्चा शादी के कुछ दिनों के भीतर पैदा हो गया हो। नोट : धारा-112 - विवाहित स्थिति के दौरान में जन्म होना धर्मजत्व का निश्चायक सबूत है : यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का जन्म उसकी माता और किसी पुरुष के बीच विधिमान्य विवाह के कायम रहते हुए, या उसका विघटन होने के उपरांत माता के अविवाहित रहते हुए दो सो अस्सी दिन के भीतर हुआ था, इस बात का निश्चायक सबूत होगा कि वह उस पुरुष का धर्मज पुत्र है, जब तक कि यह दर्शित न किया जा सके कि विवाह के पक्षकारों की परस्पर पहुंच ऐसे किसी समय नहीं थी जब उसका गर्भाधान किया जा सकता था। |
101. गौतमकुंडूबनामपश्चिमबंगालराज्य, एआईआर1993 एससी2295 | सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 112 के तहत उपधारणा को खंडित करने का एकमात्र तरीका परस्पर पहुंच के अभाव को साबित करना है तथा बायोमेडिकल साक्ष्य जैसे रक्त परीक्षण, डीएनए परीक्षण आदि को साबित करने की अनुमति नहीं है। |
102. श्रीमतीकांतिदेवीबनामपोशीराम, एआईआर2001 एससी2226 | यह अभिनिर्धारित किया गया है कि धारा 112 के तहत एक बार धर्मजता का निश्चायक सबूत प्रस्तुत कर दिया जाए, उसके बाद वास्तविक डीएनए परीक्षण द्वारा भी उसका खंडन नहीं किया जा सकता है। यदि गर्भधारण के समय में पति-पत्नी एक साथ रह रहे थे, लेकिन डीएनए परीक्षणों से पता चलता है कि बच्चा पति से पैदा नहीं हुआ था, तो विधि की निश्चायकता अखण्डनीय होगी। |
103. नंदलालवासुदेवबडबाईकबनामलतानंदलालबडवाईक (2014) 4 एससीसी (क्रि.) 65 | सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 112 के तहत निश्चायक सबूत को सामान्य रूप से किसी भी अन्य तथ्य से खंडित नहीं किया जा सकता है। हालांकि डीएनए परीक्षण एक विशुद्ध विज्ञान है और एक बार डीएनए परीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध होने के बाद, धारा 112 की उपधारणा को फिर से विखंडित किया जा सकता है। |
104. रबीन्द्रकुमारडेबनामओडिशाराज्य, (1976)4 एससीसी233 | साक्ष्य अधिनियम इस पर विचार नहीं करता है कि अभियुक्त अभियोजन पक्ष की तरह अपने मामले को उसी सख्ती के साथ साबित करे। यह पर्याप्त है कि वह संभावनाओं के प्रसार के मानक (preponderance of probabilities) द्वारा धारा 105 के तहत अपने मामले को साबित करे। |
105. संजयदत्तबनामराज्य, (1994) 5 एससीसी410 | जब वैधानिक प्रावधान द्वारा निर्दोषिता की उपधारणा उलट जाती है. तो साक्ष्य का भार उतना वजनी नहीं होना चाहिए जितना अभियोजन पक्ष के लिए होता है। |
106. पी. नरसिम्हारावबनामआंध्रप्रदेशराज्य, एआईआर2001 एससी318 | साक्ष्य अधिनियम की धारा अथ प्रथायालय को उसमें निर्दिष्ट तरीके से कुछ तथ्यों के अस्तित्व को उपधारित करने के लिए पूर्ण विवेकाधिकार प्रदान करती है। वास्तव में अस्तित्व का अवधारण करते समय न्यायालय को बौद्धिक तर्क की प्रक्रिया को लागू करने की आवश्यकता होती है जैसा की एक प्रज्ञाशील (prudent) व्यक्ति समान परिस्थितियों में करेगा। |
107. नवनीथाकृष्णनबनामराज्य, (2018) 16 एससीसी161 | यह एक अवधारित विधिक स्थिति है जो विधिक अवधारणा है कि वह व्यक्ति, जिसे अंतिम बार मृतक के साथ देखा गया था, उसने ही मृतक को मार दिया होगा। यह साबित करने के लिए कि अभियुक्त ने अपराध नहीं किया है, साबित करने का भार अभियुक्त पर है। हालांकि, इस तरह के साक्ष्य अकेले उचित संदेह से परे अभियुक्तों के अपराध को सिद्ध करने के भार का निर्वहन नहीं कर सकते हैं और इनकी संपुष्टि की जानी चाहिए। |
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विशेषाधिकृतसंसूचना | |
108. कुलविंदरसिंहएवंएकअन्यबनामपंजाबराज्य, 2015 (3) सी.सी., एस.सी. 1440 (एस.सी.) | जब शासकीय साक्षियों का साक्ष्य विश्वसनीय और विश्वास करने योग्य है, तब उनके साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि आधारित न करने का कोई कारण ही नहीं। |
109. भारतसंघबनामओरिएंटइंजीनियरिंगएंडकमर्शियलकंपनी, (1978)1 एससीसी10 | धारा 121 के अंतर्गत विशेषाधिकार एक मध्यस्थ के लिए भी उपलब्ध हैं। |
110. रामभरोसेबनामउत्तरप्रदेशराज्य, एआईआर1954 एससी704 | न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 122 के अंतर्गत संसूचना के अलावा पति या पत्नी के आचरण के कार्य संरक्षित नहीं हैं। एक पत्नी इस बात की साक्ष्य दे सकती है, कि उसके पति ने किसी निश्चित अवसर पर क्या किया, हालाँकि वह यही नहीं बता सकती कि उस अवसर पर उसने क्या कहा। |
111. क्वीनइंपरेसबनामडोनोघ, आईएलआर (1899)22 मेंड1 | प्रश्न यह था कि क्या घर की तलाशी के दौरान पुलिस द्वारा बरामद अपनी पत्नी को आरोपी द्वारा भेजी गयी एक संसूचना ग्राह्य है? यह अभिनिर्धारित किया गया कि इस पर भरोसा किया जा सकता है क्योंकि मामले में पत्नी का परीक्षा नहीं की जा रही थी और न तो इसका खुलासा करने के लिए उसे विवश किया गया था और न ही ऐसा करने की अनुमति दी गई थी। |
112. एम. सी. वर्गीजबनामटी. जे. पोन्नन, एआईआर1970 एससी1876 | यह माना जाता था कि धारा 122 के तहत निषेध केवल पति-पत्नी पर लागू होती है, न कि तीसरे व्यक्ति पर। इसके अलावा धारा 122 के तहत निषेध शादी के विघटन के बाद भी जारी रहेगी (Further the bar under Section 122 would even continue after dissalution of marriage) साक्ष्य देने के समय की स्थिति के बजाय संसूचना के समय की स्थिति को देखा जाना चाहिए। |
113. उत्तरप्रदेशराज्यबनामराजनारायण, एआईआर1975 एससी865 | धारा 123 लोक-कल्याण सर्वोपरि विधि है (Salus populi est suprema lex) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि लोक कल्याण सर्वोच्च विधि है। धारा 123 के संबंध में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि विधि की नीव सार्वजनिक हित पर आधारित है। सार्वजनिक हित जो कि साक्ष्य की माँग करता है उसे जनहित के विरुद्ध तौला जाना चाहिए। |
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गवाह/साक्षी (Witnesses) | |
114. मोहम्मदसुगलबनामदकिंग, एआईआर1946 पीसी3 | यह अभिनिर्धारित किया गया कि एक बच्चा भी एक सक्षम साक्षी है, अगर वह उससे पूछे गए प्रश्न को समझ सकता है और तर्कसंगत उत्तर दे सकता है, भले ही वह शपथ का अर्थ अथवा इसकी मंशा न समझता हो। |
115. भगवानसिंहबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर2003 एससी1088 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि बच्चे के साक्ष्य का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है क्योंकि वह यातना का एक आसान शिकार है। इसलिए, न्यायालय हमेशा अन्य साक्ष्यों से उसके साक्ष्य की पर्याप्त संपुष्टि की तलाश करती है। |
116. रतनसिंहदलसुखभाईनायकबनामगुजरातराज्य, (2004)1 एससीसी64 | कम आयु के बच्चे को साक्ष्य देने की अनुमति दी जा सकती है अगर उसके पास प्रश्नों को समझने और उसका तर्कसंगत उत्तर देने की बौद्धिक क्षमता है। |
117. कृष्णपिल्लईबनामकेरलराज्य, एआईआर1981 एससी1237 | एक हितबद्ध साक्षी के साक्ष्य को सावधानी से जांचना चाहिए। हालाँकि, जहाँ इस तरह की जाँच विश्वसनीयता स्थापित करती है, वहां ऐसे साक्ष्यों को खारिज नहीं किया जाना चाहिए। |
118. दगडूबनाममहाराष्ट्रराज्य, एआईआर1997 एससी1579 | सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 133 और धारा 114 के दृष्टांत (ख) के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं है। दृष्टांत 'हो सकता है' (May) शब्द का उपयोग करता है, इसलिए विवेकाधिकार न्यायालय के पास है। न्यायालय को यह देखने के लिए मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर गौर करना होगा कि क्या सहअपराधी विश्वसनीय है या नहीं। |
119. रबिंदरकुमारडेबनामओडिशाराज्य, एआईआर1977 एससी170 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि किसी सहअपराधी के पूरे साक्ष्य को अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए और न ही ऐसे साक्ष्य को पूरी तरह से अविश्वसनीय साक्षी माना जा सकता है। न्यायालय साक्ष्य के उस भाग पर भरोसा कर सकती है जो विश्वास प्रेरित करे। |
120. आर. बनामस्करविल्ले, (1916)2 के. बी. 658 | न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि यह आवश्यक नहीं है कि सहअपराधी संबंधित अपराध के हर विवरण स्वतंत्र संपुष्टि हो। - पर्याप्त है कि मामले की सारवान परिस्थितियों की संपुष्टि हो। |
121. सुखवंतसिंहबनामपंजाबराज्य, एआईआर1995 एससी1601 | न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि साक्षी को तब तक प्रति-परीक्षा नहीं जा सकती है, जब तक कि पहले उसकी मुख्य जांच जाए। जहां अभियोजन पक्ष ने अपने साक्षी की परीक्षा नहीं की और उसने प्रति-परीक्षा की, वहां यह अभिनिर्धारित किया गय अभियोजन ने स्वयं अपने साक्षी को छोड़ दिया। इस तरह का दृष्टिकोण अभियोजन पक्ष के मामले की विश्वसनीयता की ग को प्रभावित करता है। |
122. उत्तरप्रदेशराज्यबनामरमेशपाल, (1996) 10 एससीसी306 | सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि पक्षद्रोही साक्षी के साक्ष्य सूक्ष्म परीक्षण मांग की आवश्यकता होती है क्योंकि वह खुद का ही खंडन कर रहा है, और उसके कथन का वह हिस्सा, जो अभियोजन या बचाव पक्ष के अनुरूप है, उसको स्वीकृत किया जा सकता है। |
123. गणपतिबनामतमिलनाडूराज्य, (2018)5 एससीसी549 | किसी साक्षी को 'हितबद्ध साक्षी' तभी कहा जा सकता है, जब वह मुकदमे के परिणाम से कुछ लाभ प्राप्त करता है। इसलिए, 'संबंधित साक्षी' तथा 'हितबद्ध साक्षी' एक समान नहीं है। |
124. विद्याधरबनाममगिकराव, एआईआर1999 एससी1441 | जब वाद करने वाला पक्ष साक्ष्य नहीं देता है और स्वयं को परीक्षा के लिए प्रस्तुत नहीं करता है, तो यह उपधारित किया जाएगा कि उसके द्वारा स्थापित मामला सही नहीं है। |
125. चाकोबनामकेरलराज्य, (2004) 12 एससीसी269 | एक विश्वसनीय साक्षी बड़ी संख्या में महत्त्वहीन साक्षियों के गवाही की प्रासंगिकता को कम कर सकता है। |
126. जुवारसिंहबनाममध्यप्रदेशराज्य, एआईआर1981 एससी373 | यदि साक्षी का मौखिक साक्ष्य प्रथम दृष्टया अस्वीकार्य है, तो न्यायालय इसे केवल इसलिए स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि कोई प्रतिपरीक्षा नहीं हुई। |
127. गोपालसरवनबनामसत्यनारायण, एआईआर1989 एससी1141 | यदि साक्षी की मुख्य परीक्षा के बाद वह प्रति-परीक्षा के अधीन किए जाने के लिए उपस्थित नहीं होता, तो उसका साक्ष्य मूल्यविहीन हो जाता है। |
128. लीलाश्रीनिवासरावबनामआंध्रप्रदेशराज्य, एआईआर2004 एससी1720 | यह तथ्य कि कुछ साक्षियों को पक्षद्रोही घोषित किया गया है का परिणाम उनके साक्ष्य के स्वतः अस्वीकृति के रूप में नहीं होगा। पक्षद्रोही साक्षी के साक्ष्य भी अगर अन्य साक्ष्यों से समर्थन पाते हैं तो इस पर ध्यान दिया जा सकता है। |
129. रामचंदरबनामहरियाणाराज्य, एआईआर1981 एससी1036 | न्याय के प्रत्येक द्वार का पता लगाना पीठासीन न्यायाधीश का कर्तव्य है। उस उद्देश्य के लिए, उसे स्पष्ट रूप से धारा 165 के साथ साक्षियों से प्रश्न करने के अधिकार अभिव्यक्त रूप से निहित किया जाता है। यह अधिकार इतना व्यापक है कि वह किसी भी समय, किसी भी रूप में, किसी भी तथ्य जो चाहे सुसंगत हो अथवा असंगत, उसके बारे में प्रश्न पूछ सकता है। |
विविध (Misslenous) | |
130. राजाउर्फअय्यप्पनबनामतमिलनाडुराज्य, दाण्डिकअपीलसं. 1120 वर्ष2010, (1 अप्रैल, 2020 कोविनिश्चित) | यदि किसी कारण से संयुक्त विचारण नहीं किया जाता है, तो सहअभियुक्त की संस्वीकृति का किसी अन्य अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य में ग्राह्य होना नहीं माना जा सकता है, जो उसी वाद में समय के पश्चातवर्ती बिंदु पर विचारण का सामना करेगा। |
131. आर. जयपालबनामतमिलनाडुराज्य, (2019) 8 एस.सी.सी. 342 | यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह अनाज को फूस से अलग कर दे। जहां फूस को अनाज से अलग किया जा सकता है वहां अदालत के लिए खुला होगा कि वह अभियुक्त को दोषी ठहरा सकता है। हालांकि यदि अनाज और भूसे को अलग नहीं किया जा सकता है तो अभियोजन कथन को पूर्णतः खारिज कर दिया जाना चाहिए। |
132. रतनसिंहबनामनिर्मलगिल (सिविलअपीलसंख्या3681-3682 ऑफ2020) | उच्चतम न्यायालय ने दोहराया है कि यदि एक दस्तावेज पंजीकृत किया गया है तो एक दस्तावेज वास्तविक माना जाता है और अन्यथा साबित करने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर है जिसने कथित पंजीकृत दस्तावेज को चुनौती दी है। |
133. अर्जुनपंडितरावखोटकरबनामकैलाशकुशनरावगोरंतयालऔरअन्य, (सिविलअपीलसंख्या : 20825-20826 ऑफ2017) | उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि धारा 65 बी (4) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के माध्यम से साक्ष्य की पूर्ववर्ती ग्राह्यता के लिए एक शर्त है। जहाँ संबंधित व्यक्ति या प्राधिकारी से अपेक्षित प्रमाणपत्र आवेदन किया गया हो और व्यक्ति या प्राधिकरण या तो ऐसे प्रमाणपत्र देने से इंकार करता है या ऐसी मांग का उत्तर नहीं देता है, तो ऐसा प्रमाणपत्र मांगने वाला पक्ष साक्ष्य अधिनियम, सी पी सी या सी आर पी सी के प्रावधानों के तहत अपने उत्पादन के लिए न्यायालय को आवेदन कर सकता है। न्यायालय ने यह भी धारित किया कि यदि स्वयं मूल दस्तावेज प्रस्तुत किया जाता है तो धारा 65 बी (4) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र अनावश्यक है | उच्चतम न्यायालय की दो न्यायाधीश पीठ ने शाफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अनवर पी. वी. बनाम पी. के. बशीर के बीत मतभेद को ध्यान में रखते हुए प्रश्न का उल्लेख किया था। वह पक्ष जो डिवाइस के कब्जे में नहीं है, जिसमें से इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज का उत्पादन होता है, साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 बी (4) के तहत प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं हो सकती है। अनवर पी. वी. बनाम पी. के. बशीर में यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 65 बी के तहत आवश्यकताओं की पूर्ति न होने तक द्वितीयक साक्ष्य के रूप में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य में स्वीकार नहीं किया जाएगा। |
Download Indian Evidence Act/BSA Case Laws PDF
